नजरिया जीने का: धर्मग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भगवान हनुमान अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं और भगवान श्री राम के प्रबल भक्त हैं। भगवान हनुमान सबसे प्रसिद्ध देवताओं में से एक हैं और ऐसी मान्यता है कि वह आज भी पृथ्वी पर मौजूद हैं। कहा जाता है कि प्रभु हनुमान इस घोर कलयुग मे एक मात्र देवता हैं जो अपने भक्तों के द्वारा कम पूजन पर भी आसानी से उनका कल्याण करते हैं ।
भगवान हनुमान जी व्यक्तित्व की विशालता
भगवान हनुमान जी व्यक्तित्व कि विशालता और उनके अनगिनत कारनामों ने हमेशा से दुनिया भर के विद्वानों, विचारकों और पौराणिक कथाओं का केंद्र बिन्दु रहा है। ऐसी मान्यता है कि इस कलयुग में भगवान हनुमान जिन्हें संकटमोचन भी कहा जाता है, सबसे आसानी से और तत्क्षण हीं, नाममात्र के पूजा से भी अपने भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान राम के साथ हनुमान ने रामायण में एक सारथी की भूमिका निभाई और अपने भक्तों में खास तौर पर पूजनीय हुए।
भगवान हनुमान केसरी और अंजना के पुत्र हैं और उनका जन्म नाम अंजनेय (अंजना का पुत्र) था, लेकिन जीवन भर उन्हें उनके वीरतापूर्ण कार्यों से प्राप्त नामों से संबोधित किया गया था।
भक्तगन प्रभु हनुमान की पूजन विभिन्न प्रकार से करते हैं और उनकी प्रसन्नता के लिए हम भगवान हनुमान के शुभ जन्म की पूजा करते हैं। मंगलवार को खास दिन प्रभु हनुमान की पूजा की जाती है। इस दिन भक्तगण प्रभु हनुमान की दिव्यता की पूजा करने के साथ ही मंदिरों में बूंदी और लड्डू चढ़ते हैं।
भगवान हनुमान की पूजा करने के दो तरीके हैं; पारंपरिक पूजा और हनुमान के गुणों का ध्यान।
पूजा में रखें पारंपरिक और हनुमान के गुणों का ध्यान
ऐसी मान्यता है कि भगवान इस लोक मे तब तक तक गुप्त रूप से पृथ्वी पर रहेंगे जब तक भगवान राम का नाम गाया जाएगा, महिमामंडित और स्मरण और पूजा किया जाएगा। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भगवान हनुमान अपने गुरु रामचंद्र के चरण कमलों के प्रति काफी समर्पित रहते हैं और इसलिए प्रभु राम को प्रसन्न करके भी लोग भगवान हनुमान को खुश और प्रसन्न करने के लिए मंदिरों और घरों मे पूजन आयोजित करते हैं।
हनुमान जयंती : अनुष्ठान
सबसे पहले भक्तगन सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें जो कि किसी भी पूजन के आरंभ के लिए प्राथमिक शर्त होती है ।
पूजन स्थल पर या किसी भी पवित्र जगह पर भगवान हनुमान की मूर्ति रखें और देसी घी का दीया जलाएं।
उसके उपरांत भगवान हनुमान के मूर्ति पर लाल फूल चढ़ाएं और हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का जाप करें।
हनुमान मंदिर जाएं और भगवान हनुमान को चोला चढ़ाएं जिसमें - चमेली का तेल, वस्त्र और सिन्दूर शामिल हों।
ज्यादातर लोग घर में सुंदर कांड का पाठ कराते हैं।
इस शुभ दिन पर रामायण का पाठ करना भी लाभकारी होता है।
नजरिया जीने का : बुद्ध पूर्णिमा, जिसे वेसाक या बुद्ध जयंती के नाम से भी जाना जाता है, खासतौर पर बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और मृत्यु (या परिनिर्वाण) का दिन है और इस कारण से इस महत्वपूर्ण दिवस का खास पहचान है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पूर्णिमा जो प्रत्येक माह मे मनाई जाती है, इसका खास महत्व है। यह भारतीय और बौद्ध कैलेंडर के अनुसार वैशाख महीने की पूर्णिमा को आता है, जो आमतौर पर अप्रैल या मई के महीने में पड़ता है।
किसी कवि ने गौतम बुद्ध के बारे मे क्या खूब लिखा है-
"गौतम के दूसरा गौतम नहीं हुआ,
निकले तो बेशुमार हैं घरबार छोड़कर "
बुद्ध पूर्णिमा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह मानवता के लिए एक प्रेरणा का स्रोत भी है। यह हमें सिखाता है कि हम कैसे अच्छे जीवन जी सकते हैं और दुनिया को एक बेहतर जगह बना सकते हैं।
भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बुद्धत्व या संबोधि) और महापरिनिर्वाण ये तीनों वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति भी हुई थी।
बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था और इसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ था।
बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति
बिहार स्थित बोधगया नामक स्थान हिन्दू व बौद्ध धर्मावलंबियों के पवित्र तीर्थ स्थान हैं। गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सत्य की खोज के लिए सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहाँ उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई।
गौतम बुद्ध का जन्म:
गौतम बुद्ध का जन, 563 ई.पू. बैसाख मास की पूर्णिमा को नेपाल के लुंबिनी, शाक्य राज्य में हुआ था। इस पूर्णिमा के दिन ही 483 ई. पू. में 80 वर्ष की आयु में 'कुशनारा' में में उनका महापरिनिर्वाण हुआ था। वर्तमान समय का कुशीनगर ही उस समय 'कुशनारा' था।
बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था, जो आगे चलकर गौतम बुद्ध के नाम से जाने गए। उनके जन्म को एक दिव्य घटना के रूप में माना जाता है। कहते हैं कि उनके जन्म के समय उनके शरीर पर 32 शुभ लक्षण थे, जो उन्हें एक महान व्यक्ति के रूप में दर्शाते थे।
ज्ञान प्राप्ति:
बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था।बुद्ध पूर्णिमा का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसी दिन गौतम बुद्ध को बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह घटना उन्हें 'बुद्ध' (जाग्रत) बना देती है, और इसके बाद उन्होंने अपने ज्ञान को लोगों के साथ साझा किया।
महापरिनिर्वाण:
बुद्ध पूर्णिमा का महत्व तीसरे कारण से भी है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही कुशीनगर में गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान बुद्ध ने 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर (वर्तमान में उत्तर प्रदेश, भारत) में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था, जो उनके जीवन के अंतिम क्षणों को दर्शाता है।
भारत के चार धाम चार प्रमुख हिंदू तीर्थस्थल हैं जो देश के चार दिशाओं में स्थित हैं। ये चार धाम जिन्हे प्रमुख तौर पर जाना जाता है-बद्रीनाथ (उत्तर दिशा), द्वारका (पश्चिम दिशा), पुरी (पूर्व दिशा) तथा रामेश्वरम (दक्षिण दिशा) का हिंदू धर्म में विशेष महत्त्व है और इन्हें जीवन में एक बार अवश्य दर्शन करने योग्य माना जाता है। ये चार धाम तीर्थस्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व भी अत्यधिक हैं। यहां की यात्रा आत्मिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। आइए, इन चार धामों के बारे में विस्तार से जानते हैं:
हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार बद्रीनाथ (उत्तराखंड),द्वारका (गुजरात), जगन्नाथ पुरी (उड़ीसा) और रामेश्वरम (तमिलनाडू) चार धाम है जो विभिन्न देवी-देवताओं और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं.आश्चर्यजनक रूप से ये चरों धार भारत के चारों दिशाओं में स्थित है. आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा परिभाषित ये चार वैष्णव तीर्थ हैं जहाँ हर हिंदू को अपने जीवन काल मे अवश्य जाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इन तीर्थ स्थलों पर जाने से हिंदुओं को मोक्ष प्राप्त करने में मदद मिलती है । इसमें उत्तर दिशा मे बद्रीनाथ, पश्चिम की ओर द्वारका, पूर्व दिशा मे जगन्नाथ पुरी और दक्षिण मे रामेश्वरम धाम है। आइये जानते हैं इन प्रमुख चार धामों के बारे में विस्तृत जानकारी.
यह धाम उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है यहां बद्रीनाथ मंदिर है, जिसमें विष्णु के बद्रीनाथ रूप की मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह मंदिर चार धामों में से एक है और चार धाम यात्रा का पूर्वी धाम है। बद्रीनाथ भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है. यह अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है और चार धाम यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है.
बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की एक चरणपादुका (पैर की छाप) स्थापित है. बद्रीनाथ मंदिर को 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने बनवाया था. मंदिर परिसर में कई अन्य मंदिर और धार्मिक स्थल भी हैं, जिनमें से कुछ हैं:
तप्त कुंड: यह एक गर्म पानी का कुंड है, जिसका पानी पवित्र माना जाता है.
नारद कुंड: यह एक पवित्र कुंड है, जिसका पानी भगवान नारद को समर्पित है.
ब्रह्म कुंड: यह एक पवित्र कुंड है, जिसका पानी भगवान ब्रह्मा को समर्पित है.
गरुड़ चट्टान: यह एक चट्टान है, जिस पर भगवान गरुड़ का पदचिह्न है.
वेद व्यास गुफा: यह एक गुफा है, जहां वेद व्यास ने महाभारत की रचना की थी.
बद्रीनाथ एक अत्यंत लोकप्रिय तीर्थस्थल है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं. मंदिर परिसर को चारों ओर से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों से घेरा हुआ है, जो इसकी सुंदरता को और बढ़ा देता है. बद्रीनाथ एक शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक स्थान है, जहां लोग आकर आराम और शांति पा सकते हैं.
जगन्नाथ पुरी (Jagannath Puri):
जगन्नाथ पुरी भारत के ओडिशा राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है. यह भगवान जगन्नाथ को समर्पित एक विशाल मंदिर के लिए जाना जाता है. मंदिर को 12वीं शताब्दी में ओडिशा के राजा अनंतवर्मन ने बनवाया था. मंदिर का निर्माण लाल और सफेद बलुआ पत्थर से किया गया है और यह 135 फीट ऊंचा है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां स्थापित हैं. भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है.
जगन्नाथ पुरी एक अत्यंत लोकप्रिय तीर्थस्थल है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं. मंदिर परिसर को चारों ओर से दीवारों से घेरा हुआ है और केवल हिंदू ही मंदिर के अंदर प्रवेश कर सकते हैं. मंदिर के परिसर में एक विशाल रथ यात्रा होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को मंदिर से बाहर निकालकर शहर के चारों ओर घुमाया जाता है. रथ यात्रा एक अत्यंत भव्य और रंगीन उत्सव है, जो लाखों लोगों को आकर्षित करती है. यह धाम ओडिशा राज्य के पुरी जिले में स्थित है। जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बालभद्र, और सुभद्रा की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। यह मंदिर चार धामों में से पश्चिमी धाम है।
रामेश्वरम् (Rameswaram):
यह धाम तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम जिले में स्थित है। रामेश्वरम में श्री रामेश्वर स्वामी मंदिर है, जिसमें शिव के पृथ्वी तत्व को दर्शाने वाली ज्योतिर्लिंग की पूजा की जाती है। यह मंदिर चार धामों में से दक्षिणी धाम है।
रामेश्वरम भारत के तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले में स्थित एक द्वीप शहर है. यह शहर हिंदुओं के चार धामों में से एक है और भगवान शिव को समर्पित रामेश्वरम मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. रामेश्वरम मंदिर एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद किया था. मंदिर में भगवान शिव का एक लिंग स्थापित है, जिसे रामलिंगम कहा जाता है. रामेश्वरम मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं.
रामेश्वरम एक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है. यह शहर रामायण के कई घटनाओं से जुड़ा हुआ है. रामेश्वरम में रामेश्वरम द्वीप, रामेश्वरम मंदिर, धनुषकोटि, सीतामीनार और रामेश्वरम रेलवे स्टेशन जैसे कई ऐतिहासिक स्थल हैं. रामेश्वरम एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है और यहां हर साल लाखों पर्यटक आते हैं.
रामेश्वरम एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक स्थल है. यह शहर हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है और यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है.
यह धाम गुजरात राज्य के द्वारका जिले में स्थित है। द्वारका में द्वारकाधीश मंदिर है, जिसमें श्री कृष्ण की मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह मंदिर चार धामों में से एक है और चार धाम यात्रा का पश्चिमी धाम है।
द्वारका भारत के गुजरात राज्य के देवभूमि द्वारका ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर और नगरपालिका है. द्वारका गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है. यह हिन्दुओं के चारधाम में से एक है और सप्तपुरी (सबसे पवित्र प्राचीन नगर) में से भी एक है. यह श्रीकृष्ण के प्राचीन राज्य द्वारका का स्थल है और गुजरात की सर्वप्रथम राजधानी माना जाता है.
द्वारका का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने मथुरा से निकाले जाने के बाद द्वारका नगरी बसाई थी. द्वारका नगरी सोने और चांदी से बनी थी और यह बहुत ही समृद्ध थी. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण ने अपने सभी भाइयों और परिवार के साथ रहकर अपना राज्य चलाया था.
द्वारका नगरी का वर्णन महाभारत के आठवें स्कंध में मिलता है. महाभारत में कहा गया है कि द्वारका नगरी एक बहुत ही सुंदर नगरी थी. द्वारका नगरी में कई मंदिर और महल थे. द्वारका नगरी में एक बहुत ही विशाल समुद्र तट भी था. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण ने अपने सभी भाइयों और परिवार के साथ रहकर अपना राज्य चलाया था.
द्वारका नगरी आज भी एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण के कई मंदिर हैं. द्वारका नगरी में एक बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है, जिसका नाम द्वारकाधीश मंदिर है. द्वारकाधीश मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है. द्वारकाधीश मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है.
द्वारका नगरी एक बहुत ही पवित्र नगरी है. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण ने अपना राज्य चलाया था और उन्होंने अपने भक्तों को बहुत सारी शिक्षाएं दी थीं. द्वारका नगरी एक बहुत ही ऐतिहासिक नगरी भी है. द्वारका नगरी में कई ऐतिहासिक स्थल हैं, जो आज भी मौजूद हैं.
द्वारका नगरी एक बहुत ही लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है. द्वारका नगरी में हर साल लाखों पर्यटक आते हैं. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण के मंदिरों के अलावा, कई अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं. द्वारका नगरी में एक बहुत ही सुंदर समुद्र तट भी है. द्वारका नगरी एक बहुत ही शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक स्थान है.
चार धाम यात्रा का क्रम क्या है?
ऐसा माना जाता है कि यमुनोत्री से यात्रा की शुरुआत करने पर बिना किसी बाधा के आपकी चारधाम यात्रा पूर्ण हो जाती है। इसके साथ ही शास्त्रों में वर्णित है कि, यात्रा की शुरुआत पश्चिम से की जाती है और पूर्व में समाप्त होती है इसलिए भी सबसे पहले यमुनोत्री धाम के दर्शन किये जाते हैं। तीर्थयात्रा यमुनोत्री से शुरू होती है, गंगोत्री की ओर बढ़ती है, केदारनाथ पर जाती है और अंत में बद्रीनाथ में समाप्त होती है। यात्रा सड़क या हवाई मार्ग से पूरी की जा सकती है। कुछ भक्त दो धाम यात्रा या दो तीर्थस्थलों - केदारनाथ और बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा भी करते हैं।
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अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से हैं ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को पेशेवर सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा अपने ज्योतिषी या पेशेवर सुझाव प्रदाता से अवश्य परामर्श करें।
गुरु नानक देव जी: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म पारंपरिक रूप से कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जिसे गुरु नानक जयंती के नाम से जाना जाता है। यह सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु, गुरु नानक देव जी के जन्मदिन का उत्सव है।
क्या होता है गुरुपर्व
गुरुपर्व (पंजाबी: ਗੁਰਪੁਰਬ (गुरुमुखी)), जिसे वैकल्पिक रूप से गुरुपर्व या गुरुपरुब के रूप में जाना जाता है, सिख परंपरा में एक गुरु के जन्म की सालगिरह का उत्सव है जिसे एक त्योहार के आयोजन द्वारा चिह्नित किया जाता है।
गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को पंजाब के तलवंडी नामक गांव में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में सभी धर्मों के लोगों को एकता और प्रेम का संदेश दिया। उन्होंने सामाजिक सुधारों के लिए भी काम किया और जाति व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास किया।
गुरु नानक का जन्मदिन कैसे मनाते हैं?
गुरु नानक देव जी की जयंती को सिख धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। इस दिन सिख लोग गुरुद्वारों में जाकर गुरुग्रंथ साहिब का पाठ करते हैं। इसके अलावा, भजन-कीर्तन, लंगर और प्रभात फेरी जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
सिख लोग इस दिन का वर्षों से इन्तजार करते हैं और इस दिन को काफी उत्साह के साथ मनाते हैं. इस दिन को लोग हर साल लोग सड़कों पर आतिशबाजी और जुलूस के साथ गुरु नानक का जन्म मनाते हैं। सिख मंदिरों - गुरुद्वारों में - सिखों की पवित्र पुस्तक, गुरु ग्रंथ साहिब, को पूरा पढ़ा जाता है। मोमबत्तियाँ घरों और सार्वजनिक स्थानों जैसे कार्यालयों और दुकानों में जलाई जाती हैं।
गुरु नानक देव जी के अनमोल विचार
1 अहंकार, ईर्ष्या, लालच, लोभ मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देते हैं। ऐसे में इनसे दूर रहना चाहिए।"
2. हमें अपनी कमाई का दसवां हिस्सा परोपकार के लिए और अपने समय का दसवां हिस्सा प्रभु सिमरन या ईश्वर की भक्ति में लगाना चाहिए।
3.ईश्वर एक है और हर जगह मौजूद है। सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो। ईश्वर सब जगह उपस्थित हैं। ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी बात का भय नहीं रहता है।
4. लोगों को प्रेम, एकता, समानता, भाईचारा और आध्यात्मिक ज्योति का संदेश देना चाहिए।
5. सत्य को जानना हर एक चीज से बड़ा है और उससे भी बड़ा है सच्चाई से जीना।
दलाई लामा अपने शांति और आध्यात्मिक विचारों के कारण पूरी दुनिया में एक विलक्षण हस्ती बन चुके हैं। तिब्बत से निवासित होने के बावजूद दलाई लामा में अपने विचारों और दर्शन से शांति के पूजारीनके रूप में दुनिया में पूजे जाते हैं . आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि वास्तव में दलाई लामा एक पदवी है जो मंगोलियाई खिताब के नाम से जानी जातियां। अगर शाब्दिक अर्थ निकाली जाए तो दलाई लामा का मतलब होता है ज्ञान का महासागर। ऐसा माना जाता है कि वे भगवान अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप होते हैं।
दलाई लामा जोकि एक पदवी है, ये 14वें और वर्तमान दलाई लामा हैं जिनका नाम तेनजिंग ज्ञात्सो है।
दलाई लामा ने 31 मार्च 1959 को तिब्बत से भारत में क़दम रखा था।
दुनिया में अपने शांति के प्रतीक और मसीहा वाली छवि प्राप्त होने के कारण 1989 में दलाई लामा को शांति का नोबेल सम्मान मिला
दलाई लामा: महत्वपूर्ण कोट्स
कहने की जरूरत नहीं है कि चीन की ज्यादतियों के कारण वे अपने भूमि तिब्बत को छोड़कर भारत में शरणार्थी और निर्वासित जीवन जी रहे हैं फिर भी वो करुणा के सागर हैं। वे अपने दुश्मनों के लिए दयाभाव रखते हैं और यही उनके व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान है जिसके कारण उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया।
प्रस्तुत है उनके प्रमुख कोट्स
1.एक छोटे से विवाद से किसी रिश्ते को टूटने मत देना।
2.आप आकर्षण से ही दुसरे के दिमाग को बदल सकते हो गुस्से से नही।
जैसा कि आप जानते हैं, हफ़्ते में सात दिन होते हैं और हर दिन का एक रूलिंग प्लैनेट होता है। हिंदू कैलेंडर और एस्ट्रोलॉजी के अनुसार, किसी खास दिन जन्म लेने वाले व्यक्ति पर उस ग्रह के रूलिंग प्लैनेट का असर होता है। यहां हम शनिवार को जन्मे लोगों के बारे में बात करेंगे, इस दिन के देवता भगवान शनिदेव हैं। शनि के असर में लोग बहुत मेहनती होते हैं। क्योंकि शनि की स्पीड धीमी होती है, इसलिए वे अपने गोल को पाने में कामयाब होते हैं, भले ही धीरे-धीरे। मोटिवेटर और एस्ट्रोलॉजर हिमांशु रंजन शेखर से शनिवार को जन्मे लोगों की पर्सनैलिटी के दूसरे पहलुओं के बारे में जानें।
शनिवार को जन्मे लोग
दृढ़निश्चयी होने के साथ ही साथ वे मेहनती और जीवन के प्रति सख्त दृष्टिकोण अपनाते हैं। अनुशासन
प्रिय तथा बुद्धिमान और पेशेवर होते हैं जिनके लिए जीवन का खास महत्व होता है। एस्ट्रोलॉजी और विज्ञान के अनुसार शनि गृह अपने पथ पर काफी धीमी गति से घूमता है और जाहिर है कि शनिवार को जन्म लेने वाले लोगों पर शनि ग्रह का काफी इन्फ्लुएंस रहते है.
अनुशासनप्रिय होते हैं
वे धीमे होने के साथ स्थिर, मेहनती, अनुशासित और दूसरों से अलग होते हैं। शनिवार को जन्मे लोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे बुद्धिमान और व्यावहारिक होते हैं साथ हीं इनके जीवन में सख्त सीमाएँ और अनुशासनप्रिय होते हैं शनिवार को जन्मे लोग शनि ग्रह के प्रभाव में पैदा होते हैं और जाहिर है कि उनका जीवन शनि ग्रह के प्रभाव के अनुसार होता है। उनका संघर्ष निरंतर रहता है जो उन्हें मजबूत बनाता है और हर चीज से उबरने के लिए दृढ़ संकल्पित होना होता है अर्थात उनके जीवन मे संघर्ष लगा रहता है । वे के साथ ही वे अत्यधिक अनुशासित हैं।
मेहनती और धुन का पक्का
शनि के प्रभाव से व्यक्ति काफी मेहनती और धुन का पक्का होता है. भले ही सफलता मिलने में कुछ देरी हो सकती है लेकिन वह व्यक्ति धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल होते हैं. ये लोग थोड़े गंभीर प्रवृति के होते हैं और खुलने में काफी वक्त ले ले सकते हैं. लेकिन परिवार के लोगों के साथ इनके संबंधों में कई बार मतभेद देखने को मिलते हैं. शनिवार को जन्मे लोग हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं. वैसे इनका स्वभाव क्रोधी हो सकता है.
क्रोधी, धैर्य की काफी कमी
गुस्से पर काबू पाने में अक्सर ये लोग काफी असफल होते हैं और शायद यही वजह है कि इनके अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी काफी काम निभती है. ऐसे जातक अगर अपनी गुस्से पर नियंत्रण करना सीख लें तो जीवन में काफी आगे जा सकते हैं.
जिन जातकों का जन्म शनिवार को होता है वो सामान्यत: अंतर्मुखी प्रतिभा के धनी होते है. एकांतप्रिय होने के साथ ही वो अपनी बातों को व्यक्त करने में जल्दीबाजी कभी नहीं करते. यही वजह होता है कि प्रेम के मामलों में भी वो अपने बातों को व्यक्त नहीं कर पाते हैं. अपने प्यार का इजहार करने में काफी विलम्ब करते हैं और चाहते हैं कि उनका पार्टनर उनके फीलिंग्स को पहचान ले...
शनिवार को जन्म लेने वाले व्यक्ति परिस्थितियों के स्वामी होते हैं और कभी भी उन्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने देते.... भले ही उनके जीवन में कितने भी संघर्ष वाले दिन या संकट आये, वे उससे निकलने के लिए सही वक्त का इन्तजार करते हैं और हिम्मत नहीं हारते....
शनिवार को जन्म लेने वाले जातक दृढ इच्छा शक्ति के स्वामी होते हैं और अपने कार्यों को हर हाल में पूरा करना चाहते हैं. अपने लक्ष्य को पाने के लिए संसाधनों की कमी हो तो भी ये इन्हे जुटाने की क्षमता रखते हैं. जिस किसी क्षेत्र में इन्हे कार्य का अवसर प्रदान की जाए, उसमे हीं ये सफलता के नए सोपान प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं.
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अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से हैं ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को पेशेवर ज्योतिषीय सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा अपने ज्योतिषी या पेशेवर ज्योतिष/कुंडली सुझाव प्रदाता से अवश्य परामर्श करें।
धन अर्थात वेल्थ की प्राप्ति के लिए वॉरेन एडवर्ड बफेट के दर्शन और उद्धरण दुनिया भर के सभी युवाओं और निवेशकों के लिए एक मार्गदर्शक और सफलता के सूत्र बन गए हैं। आज सभी निवेशक और व्यवसायी बनने का सपना देखने वाले युवा उनकी सलाह का पालन करते हैं। आइये जानते हैं कि आखिर आपको अपने जीवन में धन और संपत्ति अर्जित करने के लिए वॉरेन बफेट के विचारों और उद्धरणों को अवश्य पालन करना क्यों जरुरी है?
वॉरेन बफेट कौन हैं?
वॉरेन बफेट एक अमेरिकी व्यवसायी, निवेशक और परोपकारी व्यक्ति हैं। अपने अनूठे दृष्टिकोण के कारण, वे आज ऑनलाइन धन प्रबंधन उद्योग में सबसे अधिक खोजे जाने वाले व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं।
वॉरेन एडवर्ड बफेट का जन्म 30 अगस्त, 1930 को हुआ था। वे वर्तमान में बर्कशायर हैथवे के अध्यक्ष और सीईओ हैं।
ऐसा कहा जाता है कि व्यवसायी वॉरेन बफेट को हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अस्वीकार कर दिया गया था, फिर भी वे दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और धनी मूल्य निवेशकों में से एक हैं।
बफेट के दर्शन
आज बफेट के दर्शन और उद्धरण दुनिया भर के सभी युवाओं और निवेशकों के लिए एक मार्गदर्शक और सफलता के सूत्र बन गए हैं। आज सभी निवेशक और व्यवसायी बनने का सपना देखने वाले युवा उनकी सलाह का पालन करते हैं। आज बफेट को "ओमाहा का ओरेकल" उपनाम दिया गया है, जो उनके गृह राज्य नेब्रास्का का संदर्भ है।
वॉरेन एडवर्ड बफेट विशेष रूप से निवेशकों और युवा व्यवसायियों के लिए अपने अनूठे दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। बफेट के सबसे प्रासंगिक उद्धरणों में से एक है- "कीमत वह है जो आप चुकाते हैं, मूल्य वह है जो आपको मिलता है।" यह प्रसिद्ध उद्धरण "मूल्य निवेशक" के दृष्टिकोण पर प्रहार करता है और बफेट ने अपनी दौलत कैसे बनाई, इसका रहस्य उजागर करता है।
अपने अनूठे विचारों और दृष्टिकोण से, आज उन्होंने अपनी सोच और जीवन के प्रति दृष्टिकोण से लाखों युवाओं को प्रभावित किया है। यहाँ हम आपको बफेट के प्रसिद्ध उद्धरण प्रदान करेंगे, जो "मूल्य निवेशकों" और अन्य लोगों के जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
कीमत वह है जो आप चुकाते हैं, मूल्य वह है जो आपको मिलता है। वॉरेन बफेट
आज कोई छाया में बैठा है क्योंकि किसी ने बहुत पहले एक पेड़ लगाया था। - वॉरेन बफेट
प्रतिभा या प्रयास चाहे कितने भी महान क्यों न हों, कुछ चीज़ों में समय लगता है। आप नौ महिलाओं को गर्भवती करके एक महीने में बच्चा पैदा नहीं कर सकते। - वॉरेन बफेट
सफल लोगों और सचमुच सफल लोगों के बीच का अंतर यह है कि सचमुच सफल लोग लगभग हर चीज़ के लिए 'नहीं' कह देते हैं। - वॉरेन बफेट
जब दूसरे लालची हों तो डरो और जब दूसरे डरे हुए हों तो लालची बनो। - वॉरेन बफेट
जोखिम तब आता है जब आपको पता ही नहीं होता कि आप क्या कर रहे हैं। - वॉरेन बफेट
अगर आप खुद को गड्ढे में पाते हैं तो सबसे ज़रूरी काम है खुदाई बंद कर देना। - वॉरेन बफेट
नियम संख्या 1: कभी पैसा मत गँवाओ। नियम संख्या 2: नियम संख्या 1 को कभी मत भूलना।- वॉरेन बफेट
ऐसा लगता है कि कोई विकृत मानवीय विशेषता है जो आसान चीज़ों को मुश्किल बना देती है। - वॉरेन बफेट
Chhath Puja 2025: आज अर्थात अक्टूबर 25 से नहाय खाय के साथ ही आस्था के महापर्व छठ पूजा का आरम्भ हो गया . दरअसल, नहाय खाय उत्सव का पहला दिन होता है जब भक्त छठ पूजा करने के लिए पवित्र होने हेतु डुबकी लगाते हैं। आमतौर पर भक्त अपने घर के पास की नदी/तालाबों में डुबकी लगाना पसंद करते हैं।
छठ पूजा, सूर्योपासना का एक महत्वपूर्ण हिन्दू त्योहार है जो मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को मनाया जाता है.इस दिन सूर्य देव का पूजन किया जाता है. छठ साल में दो बार मनाया जाता है. चैती छठ - यह विक्रम संवत के चैत्र माह में मनाया जाता है। कार्तिक छठ - यह विक्रम संवत के कार्तिक माह में बहुत बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।नियमतः यह व्रत चार दिन तक चलने वाला यह त्योहार है इस व्रत को महिलाये तथा पुरुष सभी मिलजुलकर करते है.
छठ पूजा एक महत्वपूर्ण हिन्दू त्योहार है। यह त्योहार सूर्य भगवान की पूजा के लिए मनाया जाता है। छठ पूजा के विभिन्न चरण व्रतियों के लिए एक चुनौती होते हैं, लेकिन यह चुनौती व्रतियों को आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाती है।
छठ पूजा के विभिन्न चरणों की व्याख्या इस प्रकार है:
नहाय खाय:
खरना:
संध्या अर्घ्य:
उषा अर्घ्य:
नहाय खाय
छठ पूजा का पहला चरण नहाय खाय है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है। इस चरण में व्रती अपने शरीर को शुद्ध करते हैं और उपवास शुरू करते हैं। इस दिन व्रती स्नान करके साफ कपड़े पहनते हैं और फलाहार करते हैं। इस दिन से व्रतियों को 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है।
खरना
छठ पूजा का दूसरा चरण खरना है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होता है। इस चरण में व्रती खरना का भोजन करते हैं, जो एक पौष्टिक भोजन है। यह भोजन व्रतियों को उपवास के दौरान ऊर्जा प्रदान करता है। इस दिन व्रती सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और खिचड़ी और गुड़ खाकर उपवास शुरू करते हैं। खरना के भोजन में खिचड़ी, गुड़, अरवा चावल, चना, मटर, मूंग, तिल, घी, आदि शामिल होते हैं। खरना के बाद व्रती शाम तक उपवास रखते हैं।
संध्या अर्घ्य
छठ पूजा का तीसरा चरण संध्या अर्घ्य है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को होता है। इस चरण में व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। यह अर्घ्य सूर्य भगवान को धन्यवाद देने के लिए दिया जाता है। इस दिन व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के लिए व्रती घर के पास नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। अर्घ्य में चावल, गुड़, दूध, फल, आदि शामिल होते हैं।
उषा अर्घ्य
छठ पूजा का चौथा चरण उषा अर्घ्य है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है। र्घ्य: इस चरण में व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। यह अर्घ्य सूर्य भगवान को प्रणाम करने के लिए दिया जाता है।इस दिन व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। उषा अर्घ्य देने के लिए व्रती सूर्योदय से पहले घर के पास नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। उषा अर्घ्य देने के बाद व्रती अपना उपवास तोड़ते हैं।
अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी है जो विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आस्था पर आधारित हैं.ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो कि आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को पेशेवर सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा सम्बंधित एक्सपर्ट से अवश्य परामर्श करें।
कार्तिक स्नान 2025 : हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। 2025 में कार्तिक पूर्णिमा 05 नवंबर 2025 को सोमवार को है।
हिंदू धर्म में कार्तिक मास को सबसे पवित्र मास माना जाता है और यही कारण है कि कार्तिक महीने में विशेष रूप से पूजा और देवताओं के लिए विशेष रूप से अर्चना का योग बनता है. सबसे पतित्र और आस्था का महा पर्व छठ के साथ ही दीपावली, तुलसी विवाह, कार्तिक पूर्णिमा, भैया दूज, चित्रगुप्त पूजा, गोवर्धन पूजा के साथ ही कार्तिक स्नान का भी विशेष स्थान है.
भगवान विष्णु की पूजा करने का विशेष महत्व
हिन्दू मान्यता के अनुसर इस मास में भगवान विष्णु की पूजा करने का विशेष महत्व है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष विधान है। मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कार्तिक स्नान का महत्व निम्नलिखित है:
कार्तिक स्नान से मनुष्य के शरीर से सभी प्रकार के पाप धुल जाते हैं।
कार्तिक स्नान से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कार्तिक स्नान से मनुष्य का शरीर स्वस्थ रहता है और उसे सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है।
कार्तिक स्नान से मनुष्य की बुद्धि बढ़ती है और उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है।
कार्तिक स्नान से मनुष्य के जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
कार्तिक स्नान कब मनाते हैं
हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। 2025 में कार्तिक पूर्णिमा 05 नवंबर 2025 को सोमवार को है।
कार्तिक स्नान कैसे मनाते हैं
हिन्दू पंचांग और मान्यताओं के अनुसार कार्तिक स्नान का विशेष स्थान है. ऐसा कहा गया है कि स्नान करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए। स्नान करने से पहले घर के मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा करें। फिर, किसी पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करें। स्नान करते समय "आपस्त्वमसि देवेश ज्योतिषां पतिरेव च।" मंत्र का जाप करें। स्नान करने के बाद, स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु को प्रसाद अर्पित करें।
कार्तिक स्नान करने के कुछ नियम निम्नलिखित हैं:
कार्तिक स्नान करने से पहले किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन नहीं खाना चाहिए।
कार्तिक स्नान करते समय किसी भी प्रकार का अभद्र व्यवहार नहीं करना चाहिए।
कार्तिक स्नान करने के बाद, किसी भी प्रकार का झूठ बोलना नहीं चाहिए।
कार्तिक स्नान एक पवित्र पर्व है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।
कार्तिक स्नान क्यों किया जाता है?
ऐसी मान्यता है कि कार्तिक मास में ही भगवान विष्णु निद्रा से जागते हैं जैसा कि देवउठान एकादसी भी मनाया जाता है. कहा जाता है कि भगवन विष्णु अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं और इस मास में भगवान विष्णु पृथ्वी पर अपने भक्तों के बीच जल में निवास करते हैं. इसलिए कार्तिक माह में गंगा स्नान का विशेष महत्व है.
रंगोली 2025: त्योहारों के मौसम में रंगोली हमारे घर की सजावट का एक अहम हिस्सा होती है। दरअसल, रंगोली सिर्फ़ सजावट का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसे सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। रंगोली एक प्राचीन कला है जिसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और लगभग सभी घरों में त्योहारों के उत्सव के रूप में इसका पालन किया जाता है। रंगोली को तमिलनाडु में कोलम, पश्चिम बंगाल में अल्पना, आंध्र प्रदेश में मुग्गू आदि नामों से जाना जाता है।
आप यहाँ दिए गए रंगोली डिज़ाइन 2025 बनाने के आसान चरणों का पालन करके अपने घर को अलग-अलग रंगोली डिज़ाइनों से सजा सकते हैं।
रंगोली पर बनाएं जाने वाले विभिन्न डिज़ाइन
यहाँ हम रंगोली बनाने की सभी नवीनतम और अपडेटेड तरकीबें बता रहे हैं, जिनमें छोटी रंगोली, दिवाली के लिए सरल रंगोली डिज़ाइन, मोर रंगोली, मोर रंगोली, लक्ष्मी पदचिन्ह रंगोली शामिल हैं, जो आपकी दिवाली के उत्सव में चार चाँद लगा देंगी।
दिवाली और रंगोली
आमतौर पर हम दिवाली का त्योहार धन और पैसे की देवी मानी जाने वाली देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए मनाते हैं। रंगोली बनाना भी देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए सजावट का एक हिस्सा है। यही कारण है कि घर के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाई जाती है ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा के साथ-साथ प्रभावशाली रूप भी आए और देवी लक्ष्मी का स्वागत भी हो, जैसा कि माना जाता है।
रंगोली का थीम जरुरी
रंगोली बनाना इस बात पर निर्भर करता है कि आपने किस थीम पर रंगोली बनाई है। हालाँकि, रंगोली विभिन्न रंगों का मिश्रण होती है और अपनी डिज़ाइन के कारण प्रभावशाली दिखती है. लेकिन आजकल रंगोली बनाना युवा लड़कियों के लिए एक जुनून बन गया है। आमतौर पर रंगोली का विषय विभिन्न फूलों, अमूर्त डिज़ाइनों, कलश जैसे शुभ चिह्नों और अन्य चीज़ों पर निर्भर करता है।
आज अर्थात अक्टूबर 25 से नहाय खाय के साथ ही आस्था के महापर्व छठ पूजा का आरम्भ हो गया . दरअसल, नहाय खाय उत्सव का पहला दिन होता है जब भक्त छठ पूजा करने के लिए पवित्र होने हेतु डुबकी लगाते हैं। आमतौर पर भक्त अपने घर के पास की नदी/तालाबों में डुबकी लगाना पसंद करते हैं।
इस साल खरना 26 अक्टूबर (रविवार) 2025 को मनाया जा रहा है. छठ पूजा के दूसरे दिन, जिसे खरना कहा जाता है, का विशेष महत्व है। बिना जल के व्रत के लिए फ़ास्ट करना आसान नहीं होता है और यही वजह है कि छठ के पूजा के लिए शारीरिक रूप से अतिरिक्त मानसिक रूप से भी व्रती को तैयार रहना पड़ता है.
खरना इस प्रकार से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है क्योंकि इस दिन व्रती महिलाएं और पुरुष छठी माता की पूजा के लिए प्रसाद तैयार करते हैं। खरना के प्रसाद में गन्ने के रस में बनी खीर, दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी शामिल होती है। इस प्रसाद में नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है।
खरना का महत्व निम्नलिखित है:
तन और मन की शुद्धिकरण: खरना के दिन व्रती तन और मन दोनों की शुद्धिकरण करते हैं। इस दिन व्रती स्नान करके साफ कपड़े पहनते हैं। प्रसाद को मिट्टी के चूल्हे पर तैयार किया जाता है, जो प्रकृति के साथ जुड़ाव को दर्शाता है। 36 घंटे के निर्जला व्रत की तैयारी: खरना के बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं। खरना के प्रसाद से व्रती को उर्जा मिलती है, जो उन्हें निर्जला व्रत के लिए तैयार करता है।
छठी माता की पूजा: खरना के प्रसाद को छठी माता को अर्पित किया जाता है। इससे छठी माता प्रसन्न होती हैं और व्रती की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
शुद्धिकरण और स्व-तैयारी:
खरना व्रती की शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों तरह से शुद्धिकरण प्रक्रिया का प्रतीक है। खरना के दिन, वे कठोर उपवास करते हैं, शाम को केवल एक बार भोजन करते हैं, जिसमें गुड़ से बनी खीर और एक विशेष प्रकार के चावल जिसे अरवा चावल कहा जाता है, शामिल होता है। ऐसा माना जाता है कि यह सरल और शुद्ध भोजन शरीर और मन को शुद्ध करता है, उन्हें गहन भक्ति और तपस्या के लिए तैयार करता है।
छठी मैया के प्रति भक्ति और कृतज्ञता:
खरना भक्तों के लिए छठी मैया के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय है। वे प्रार्थना करते हैं और अनुष्ठान करते हैं, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। खरना पर बनाई जाने वाली विशेष खीर सिर्फ एक भोजन नहीं है बल्कि देवी को एक प्रसाद है, जो उनकी अटूट आस्था और समर्पण का प्रतीक है।
समापन अनुष्ठान की तैयारी:
खरना छठ पूजा के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों के लिए एक तैयारी चरण के रूप में कार्य करता है, अर्थात् डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देना। खरना पर सख्त उपवास और शुद्धिकरण प्रक्रिया भक्तों को अर्घ्य प्रसाद के दौरान मनाए जाने वाले 36 घंटे के निर्जला व्रत, पानी के बिना निरंतर उपवास, का सामना करने के लिए आवश्यक शारीरिक और मानसिक शक्ति विकसित करने में मदद करती है।
संक्षेप में, खरना छठ पूजा यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भक्तों की आस्था के प्रति प्रतिबद्धता, छठी मैया के प्रति उनके समर्पण और इस प्राचीन और अत्यधिक पूजनीय त्योहार के सार का प्रतीक अंतिम अनुष्ठानों के लिए उनकी तैयारी का प्रतीक है।
अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी है जो विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आस्था पर आधारित हैं.ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो कि आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को पेशेवर सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा सम्बंधित एक्सपर्ट से अवश्य परामर्श करें।
Chhath Puja 2025: आज अर्थात अक्टूबर 25 से नहाय खाय के साथ ही आस्था के महापर्व छठ पूजा का आरम्भ हो गया . दरअसल, नहाय खाय उत्सव का पहला दिन होता है जब भक्त छठ पूजा करने के लिए पवित्र होने हेतु डुबकी लगाते हैं। आमतौर पर भक्त अपने घर के पास की नदी/तालाबों में डुबकी लगाना पसंद करते हैं। वैसे तो छठ पूजा खास तौर पैर उत्तर भारत और खासतौर से बिहार,यूपी,झारखंड में व्यापक पैमाने पर मनाया जाता है, लेकिन अब यह महज इन इलाके तक ही सीमित नहीं रहा गया है. चार चरणों में मनाया जाने वाले छठ पूजा का शुरुआत नहाय-खाय से शुरू होता है जो पारण अर्थात भोर के अर्ध्य के साथ समापन होता है. आइये जानते हैं कि आस्था का महापर्व छठ कैसे और किन तिथियों को इस साल मनाया जा रहा है.
जैसा कि आप जानते हैं कि छठ पूजा का त्योहार नहाय-खाय से शुरू होता है. इस दिन व्रती नहाय खाय के साथ व्रत का आरंभ करती हैऔर खुद को तथा व्रत को करने के लिए पूजा करने वाले कमरे को शुद्ध किया जाता है.
इसके साथ ही छठ पूजा कर आरम्भ जो जाता है जो अगले दिन यानि अगले चरण खरना में प्रवेश करता है.
नहाय खाय- छठ पूजा की शुरुआत नहाय खाय से होती है जो इस साल 25 अक्टूबर (शनिवार) 2025, को मनाई जाएगी. इस दिन व्रती नहाय खाय के साथ व्रत का आरंभ करती है
खरना- खरना छठ पूजा का दूसरा चरण होता है जो नहाये खाय के बाद और संध्या अर्ध्य के ठीक पहले किया जाता है. पंचांग के अनुसार खरना कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है.
उगते सूर्य को अर्घ्य- इस दिन ही छठ पूजा होती है जो इस साल 27 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी. संध्या अर्ध्य के लिए व्रती किसी पोखर, तालाब, नदी के किनारे घाट का निर्माण करते हैं और वही पर जाकर अपने पुरे परिवार के साथ शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.
डूबते सूर्य को अर्घ्य- छठ पूजा का अंतिम चरण भोर का अर्ध्य होता है जो 28 अक्टूबर 2025 को मनाई जा रही है. इस दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है जइसे पारण भी कहा जाता है जिसके साथ ही छठ व्रत को पूरा हो जाता है.
अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी है जो विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आस्था पर आधारित हैं.ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो कि आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को पेशेवर सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा सम्बंधित एक्सपर्ट से अवश्य परामर्श करें।
आज अर्थात अक्टूबर 25 से नहाय खाय के साथ ही आस्था के महापर्व छठ पूजा का आरम्भ हो गहा. दरअसल, नहाय खाय उत्सव का पहला दिन होता है जब भक्त छठ पूजा करने के लिए पवित्र होने हेतु डुबकी लगाते हैं। आमतौर पर भक्त अपने घर के पास की नदी/तालाबों में डुबकी लगाना पसंद करते हैं।
छठ पूजा, जो सूर्योपासना का एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है जिसे महापर्व भी कहा जाता है, यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। जहाँ तक छठ पूजा का नियम का सवाल है, यह बहुत हीं कठिन,अनुशाषित और संयम से पूर्ण होता है. छठ पूजा को महापर्व कहा जाता है और इसके लिए काफी संयम और सफाई के साथ अनुशासन को मानना पड़ता है.
छठ पूजा के मनाने के लिए सबसे जरुरी है कि व्रती को बिलकुल साफ-सुथरे कपड़े पहन कर ही छठ पूजा का प्रसाद बनाना चाहिए। खरना और संध्या अर्ध्य के साथ ही छठ महापर्व के चारों दिन जमीन पर चटाई बिछाकर सोना चाहिए.क्योंकि छठ पूजा में व्रती का बिस्तर पर सोना वर्जित माना जाता है.इसके साथ हीं व्रती के लिए छठ पूजा के समय बहुत आत्म संयम रखना चाहिए.
छठ पूजा 2025: Date
25 अक्टूबर 2025 (शनिवार) : नहाय-खाय
26 अक्टूबर 2025 (रविवार) : लोखंड/ खरना
27 अक्टूबर 2025 (सोमवार) : संध्याकालीन अर्घ्य
28 अक्टूबर 2025 (मंगलवार): प्रातःकालीन अर्घ्य
सायं अर्ध्य 27 अक्टूबर (सोमवार) 2025 को और सुबह का अर्ध्य 28 अक्टूबर (मंगलवार) 2025 को संपन्न होगी. भक्त भगवान सूर्य के लिए प्रसाद तैयार करते हैं। दूसरे और तीसरे दिन को खरना और छठ पूजा कहा जाता है - इन दिनों के दौरान महिलाएं कठिन निर्जला व्रत रखती हैं। आइये जानते हैं छठ पूजा के सभी चरणों जैसे नहाय खाय, खरना, संध्या और उषा अर्ध्य की क्या है विशेषता और महत्त्व.
नहाय खाय: महत्व
छठ पूजा का पहला चरण नहाय खाय होता है जिसका प्रकुख उद्देश्य होता है कि व्रती शुद्ध होकर व्रत के लिए तैयार हो जाती है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है जो छठ पूजा का प्रथम चरण कहा जाता है। स्नान के बाद वे साफ कपड़े पहनते हैं। फिर वे फलाहार करते हैं। फलाहार में आमतौर पर फल, दूध, दही, आदि शामिल होते हैं। इस दिन व्रती स्नान करके साफ कपड़े पहनते हैं और फलाहार करते हैं। इस दिन से व्रतियों को 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है।
खरना: महत्व
छठ पूजा का दूसरा चरण खरना है जो सामान्य पंचांग के अनुसर कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होता है। खरना का दिन एक महत्वपूर्ण दिन है जिसका प्रकुख उद्देध्य प्रतीत होता जो तियों को छठ पूजा के लिए तैयार करता है।खरना के दिन व्रती सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और उपवास शुरू करते हैं। खरना के भोजन में खिचड़ी, गुड़, अरवा चावल, चना, मटर, मूंग, तिल, घी, आदि शामिल होते हैं। खरना के बाद व्रती शाम तक उपवास रखते हैं। यह छठ पूजा के दूसरे दिन का पहला भोजन है जो यह व्रतियों के लिए ऊर्जा का स्रोत माना है। यह व्रतियों को उपवास के लिए तैयार करता है।
खरना के दिन प्रसाद बनाने की परंपरा भी है। प्रसाद में ठेकुआ, पंचामृत, आदि शामिल होते हैं। प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के चूल्हे का उपयोग किया जाता है। प्रसाद को छठी मैया को अर्पित किया जाता है।
संध्या अर्घ्य : महत्व
छठ पूजा का तीसरा चरण संध्या अर्घ्य है जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को होता है। यह छठ पूजा का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है जिसके अंतर्गत व्रती और परिवार के सभी सदस्य इस दिन व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के लिए व्रती घर के पास नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। अर्घ्य में ठेकुआ, केला, अदरक, वल, गुड़, दूध, फल, आदि शामिल होते हैं जिन्हे भगवन सूर्य को अर्ध्य देने के लिए प्रयोग किया जाता है।
संध्या अर्घ्य छठ पूजा के तीसरे दिन की सबसे महत्वपूर्ण रस्म है जिसके अंतर्गत मान्यता है कि यह सूर्य भगवान को धन्यवाद देने का अवसर है। कहा जाता है कि डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य देने की यह अनोखी प्ररम्परा है जो छठ में देखने को मिलती है. सामान्यता लोग उगते हुए सूर्य को ही देखना चाहते हैं लेकिन छठ में डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य देने की परंपरा भी शामिल है. यह व्रतियों की प्रार्थनाओं को सूर्य भगवान तक पहुंचाने का एक तरीका है।
उषा अर्घ्य: महत्व
छठ पूजा का चौथा और अंतिम चरण उषा अर्घ्य है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है। इस दिन व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। उषा अर्घ्य के दिन व्रती सूर्योदय से पहले नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। व्रती एक मिट्टी के बर्तन में चावल, गुड़, दूध, फल, आदि लेकर जाते हैं। व्रती सूर्य भगवान की पूजा करते हैं और उन्हें अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के बाद व्रती फल और मिठाई खाते हैं। उषा अर्घ्य देने के लिए व्रती सूर्योदय से पहले नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। उषा अर्घ्य देने के बाद व्रती अपना उपवास तोड़ते हैं।
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अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी है जो विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आस्था पर आधारित हैं.ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो कि आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को पेशेवर सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा सम्बंधित एक्सपर्ट से अवश्य परामर्श करें।
Chhath Puja 2025: दिवाली के समापन के साथ हीं आस्था के महापर्व अर्थात छठ की तैयारी शुरू होती है। इस वर्ष अर्थात Chhath 2025 का सांध्यकालीन अर्ध्य 27 अक्टूबर 2025 को तथा अस्ताचलगामी अर्थात डूबते सूर्य को मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025 को अर्घ्य अपर्ण की जाएगी।
छठ पूजा एक ऐसा पावन पर्व है जिसे भले हीं घर की महिला करती है, लेकिन उसे पूर्ण रूप से संपन्न करवाने में पूरा परिवार केसदस्यों को लगना पड़ता है। छठ पर्व में जितनी तैयारी घर के अंदर करनी होती है, इससे भी ज्यादा छठ घाट के लिए करना होगा हैं जहाँ सूर्य देव और छठी मैया के लिए एक शांत और गहन आध्यात्मिक वातावरण तैयार किया जा सके। जाहिर है कि छठ घाट को सजावट और डेकोरेट करना भी उतना हीं जरुरी होता है क्योंकि सुबह और शाम का अर्ध्य जो सूरज भगवन को दिया जाता है,वह छठ घाट पर हीं संपन्न होता है.
घाट की सजावट में प्रकाश, सादगी और पारंपरिक, प्राकृतिक तत्वों का उपयोग किया जाता है ताकि सूर्य देव और छठी मैया के लिए एक शांत और गहन आध्यात्मिक वातावरण तैयार किया जा सके। ध्यान रखें की छठ पूजा की सामग्री से भरे हुए बांस के सूप (Dala) और दौरा (टोकरी) को खास तौर पर सजाने के लिए ध्यान दिया जाना चाहिए. इसके लिए इन्हे ढकने के लिए लाल, पीले कपड़े या फूलों से हल्की सजावट की जा सकती है।
छठ घाट की प्रभावशाली और पारंपरिक सजावट के लिए कुछ प्रमुख विचार इस प्रकार हैं:
दीये/मोमबत्तियाँ: यह सबसे ज़रूरी तत्व है। घाट की सीढ़ियों पर, अर्घ्य क्षेत्र के चारों ओर और घाट के किनारों पर जलते हुए मिट्टी के दीयों (दीयों) या छोटी मोमबत्तियों की कतारें लगाएँ। हज़ारों छोटे दीयों की सामूहिक चमक एक मनमोहक, पवित्र और प्रभावशाली छवि बनाती है, खासकर सूर्यास्त (संध्या अर्घ्य) और सूर्योदय (उषा अर्घ्य) के समय।
स्ट्रिंग लाइट्स (फेयरी लाइट्स): आज जबकि दिया का स्थान स्ट्रिंग लाइट और रंगीन लाईट ने ले लिए है, मुख्य पूजा क्षेत्र, रेलिंग या आस-पास के पेड़ों की सीमा को रेखांकित करने के लिए साधारण, गर्म रंग की स्ट्रिंग लाइट्स (एलईडी फेयरी लाइट्स) का उपयोग करना ज्यादा सही होगा. खासतौर पर रात के अंध्रेरे में लाईट की जगमगाहट छठ घाट की सजावट में चार चाँद लगा देता है।
फूलों की सजावट: गेंदे के फूल, और फूलों की पंखुड़ियों की रंगोली से भी घाट सजाना अच्छा लगता है. आखिर बगैर फूल के सजावट की कल्पना भी कैसे की जा सकती है. घाट के प्रवेश द्वार पर तोरण बनाकर या पानी की ओर जाने वाले रास्ते के किनारों को सजाने के लिए गेंदे की लंबी लड़ियों का इस्तेमाल करें। त्योहार की पर्यावरण-अनुकूल भावना को ध्यान में रखते हुए, कृत्रिम रंगों के बजाय ताज़ी फूलों की पंखुड़ियों (विशेषकर गेंदा, गुलाब और कमल की पंखुड़ियों) का उपयोग करके अर्घ्य क्षेत्र के पास ज़मीन पर बड़ी, जीवंत रंगोली बनाएँ।
केले के पेड़ के डंठल: केला के फल उसके पते और पेड़ को भी हिंदू सभ्यता संस्कृति में शुभ माना जाता है. इसके अतिरिक्त केला को समृद्धि के प्रतीक और पवित्र स्थान को चिह्नित करने के लिए उसके प्रयोग किया है. छठ घाट की सजावट पारंपरिक रूप से केले के पेड़ के डंठलों को अर्घ्य क्षेत्र के किनारों पर रखा जाता है।
व्यवस्थित अर्पण क्षेत्र: सूप (टोकरियाँ) की व्यवस्था: प्रसाद को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित करने से सबसे सुंदर छवि बनती है। अर्घ्य से पहले पानी के किनारे फलों, ठेकुआ, गन्ने और दीयों से भरी सजी हुई बाँस की टोकरियाँ (सूप या दौरा) व्यवस्थित करें, और उन्हें साफ-सुथरे और पारंपरिक तरीके से रखें।
प्रभावशाली छवि के लिए सुझाव:स्वच्छता और व्यवस्था: छठ घाट का सबसे प्रभावशाली पहलू उसकी पवित्रता और स्वच्छता है। सुनिश्चित करें कि क्षेत्र की सावधानीपूर्वक सफाई की गई हो और सभी सजावट व्यवस्थित रूप से की गई हो।
प्राकृतिक तत्वों पर ध्यान दें: चूँकि छठ प्रकृति (सूर्य, जल और पृथ्वी) को समर्पित एक त्योहार है, इसलिए प्लास्टिक या कृत्रिम सामग्रियों की बजाय बायोडिग्रेडेबल और प्राकृतिक सजावट (फूल, मिट्टी के दीये, गन्ना, फल) को प्राथमिकता दें।
शुभ रंगों का प्रयोग करें: त्योहार से जुड़े पारंपरिक, चमकीले रंगों, जैसे पीला, लाल और नारंगी, जो सूर्य और शुभता के प्रतीक हैं, को कपड़ों, फूलों और रंगोली के माध्यम से शामिल करें।
छठ पूजा 2025: भारत त्योहारों का देश है और यहाँ के हर खास आयोजन और तैयारियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है रंगोली का निर्माण। जी हाँ, रंगोली का धार्मिक महत्व है और यह देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए बनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि यह बुरी आत्माओं को दूर रखता है और सद्भाव को बढ़ावा देता है। रंगोली बनाने के लिए हालाँकि अनगिनत डिज़ाइन हो सकते हैं लेकिन आप खास तौर पर लक्ष्मी जी के पद चिन्ह, स्वास्तिक, कमल का फूल:,मोर:आदि को रंगोली में स्थान दे सकते हैं जिन्हे काफी शुभ और घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है.
रंगोली बनाने से कलात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा मिलता है और समुदाय एक साथ आते हैं। इसका उपयोग पूजा कक्षों और मंदिरों में प्रसाद के रूप में भी किया जाता है, जिससे आध्यात्मिक वातावरण बढ़ता है।
इस दिन लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करके, रंगोली बनाकर, दीये जलाकर और मिठाई खाकर इस त्योहार को मनाते हैं।
दीपावली में रंगोली बनाने का विशेष महत्व है। रंगोली को हिंदू धर्म में शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि रंगोली बनाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मां लक्ष्मी का आगमन होता है। रंगोली बनाने से घर की सुंदरता भी बढ़ जाती है।
आप पारंपरिक चौथाई आकार के बजाय इस सरल अर्ध-वृत्त रंगोली पैटर्न का उपयोग कर सकते हैं। कोने में एक मध्यम आकार की उर्ली कटोरी स्थापित करने के बाद, कटोरी के चारों ओर आधा गोलाकार रंगोली बनाएं। डिज़ाइन को पूरा करने के लिए, रंगोली को भरने के लिए फूलों और पंखुड़ियों के बीच पत्तियां डालें।
दीपावली में रंगोली के कई प्रकार बनाए जाते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख प्रकार हैं:
लक्ष्मी जी के पद चिन्ह:
यह रंगोली सबसे लोकप्रिय रंगोली है। इसमें मां लक्ष्मी के पद चिन्ह बनाए जाते हैं।
स्वास्तिक:
स्वास्तिक एक शुभ प्रतीक है। इसे रंगोली में बनाने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती
कमल का फूल:
कमल का फूल शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है। इसे रंगोली में बनाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
मोर:
मोर को सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है। इसे रंगोली में बनाने से घर की सुंदरता बढ़ जाती है।
रंगोली बनाने के तरीके
रंगोली बनाने के लिए सबसे पहले एक साफ-सुथरा स्थान चुनें। फिर उस स्थान को रंगोली बनाने के लिए तैयार कर लें। इसके लिए आप उस स्थान पर चावल का आटा या गोबर का घोल लगा सकते हैं।
रंगोली बनाने के लिए आपको रंगों की आवश्यकता होगी। आप अपनी पसंद के रंगों का उपयोग कर सकते हैं। रंगोली बनाने के लिए आप सूखे रंगों का उपयोग कर सकते हैं या फिर रंगोली पाउडर का उपयोग कर सकते हैं।
रंगोली बनाने के लिए सबसे पहले एक सरल डिजाइन चुनें। फिर उस डिजाइन को उस स्थान पर बनाएं जिस स्थान पर आप रंगोली बनाना चाहते हैं। आप अपनी पसंद के अनुसार डिजाइन में बदलाव भी कर सकते हैं।
रंगोली बनाने के लिए आप एक रंगोली बनाने की स्टेंसिल का उपयोग भी कर सकते हैं। स्टेंसिल का उपयोग करने से आपको रंगोली बनाने में आसानी होगी।
रंगोली बनाने के बाद उसे सुखाने दें। फिर उस स्थान पर दीये जलाएं।
सुंदर रंगोली बनाने के कुछ टिप्स
रंगोली बनाने के लिए हमेशा साफ-सुथरे रंगों का उपयोग करें।
रंगोली बनाते समय सावधानी बरतें कि रंगोली में कोई गड़बड़ी न हो।
रंगोली बनाते समय अपनी कल्पना का उपयोग करें और कुछ अलग और आकर्षक डिजाइन बनाएं।
रंगोली बनाते समय समय का ध्यान रखें और उसे जल्दी-जल्दी न बनाएं।
रंगोली बनाने के लिए क्या सामग्री चाहिए?
सामान्य रूप से रंगोली बनाने की प्रमुख सामग्री है- पिसे हुए चावल का घोल, सुखाए हुए पत्तों के पाउडर से बनाया रंग, चारकोल, जलाई हुई मिट्टी, लकड़ी का बुरादा आदि। रंगोली का तीसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व पृष्ठभूमि है। रंगोली की पृष्ठभूमि के लिए साफ़ या लीपी हुई ज़मीन या दीवार का प्रयोग किया जाता है।
Chhath 2025: त्योहारों के मौसम में रंगोली हमारे घर की सजावट का एक अहम हिस्सा है। दरअसल, रंगोली सिर्फ़ सजावट का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसे सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। रंगोली एक प्राचीन कला है जिसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और लगभग सभी घरों में त्योहारों के उत्सव के रूप में इसका पालन किया जाता है। यहाँ हम रंगोली बनाने की सभी नवीनतम और अपडेटेड तरकीबें बता रहे हैं, जिनमें छोटी रंगोली, दिवाली के लिए सरल रंगोली डिज़ाइन, मोर रंगोली, मोर रंगोली, लक्ष्मी पदचिन्ह रंगोली शामिल हैं, जो आपकी दिवाली के उत्सव में और भी रंग भर देंगी।
भारतीय संस्कृति और रंगोली
रंगोली को तमिलनाडु में कोलम, पश्चिम बंगाल में अल्पना, आंध्र प्रदेश में मुग्गू आदि नामों से जाना जाता है।हर रंगोली डिज़ाइन अपनी आकृति और रंगों में भारतीय परंपरा की गहराई और संस्कृति की सुंदरता को संजोए हुए होता है। यह न केवल सौंदर्य और कला का प्रतीक है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा, खुशहाली और समृद्धि का भी द्योतक माना जाता है। रंगोली के रंग हमारे जीवन में उल्लास भरते हैं और देवी लक्ष्मी का स्वागत करने का शुभ संकेत देते हैं। हर रंगोली डिज़ाइन अपनी आकृति और रंगों में भारतीय परंपरा की गहराई और संस्कृति की सुंदरता को संजोए हुए होता है।
दिवाली रंगोली
आमतौर पर हम दिवाली का त्यौहार धन और पैसे की देवी मानी जाने वाली देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए मनाते हैं। रंगोली बनाना भी देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए सजावट का एक हिस्सा है। इसीलिए घर के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाई जाती है ताकि सकारात्मक ऊर्जा के साथ प्रभावशाली रूप मिले और देवी लक्ष्मी का स्वागत भी हो। ऐसा माना जाता है।
रंगोली बनाना
रंगोली आमतौर पर चावल के पाउडर और चाक से बनाई जाती है, हालाँकि आजकल बाज़ार में कई तरह के रंग उपलब्ध हैं, जिससे रंगोली बनाने वालों को असीमित रंगों के साथ एक अनूठी थीम के साथ रंगोली बनाने की आज़ादी मिलती है।
रंगोली बनाने के आसान तरीके
रंगोली बनाना इस बात पर निर्भर करता है कि आपने रंगोली के लिए कौन सी थीम चुनी है। हालाँकि, रंगोली विभिन्न रंगों का मिश्रण होती है और अपनी डिज़ाइन के कारण प्रभावशाली दिखती है... लेकिन आजकल रंगोली बनाना युवा लड़कियों के लिए एक जुनून बन गया है।
रंगोली के पारंपरिक डिज़ाइन
रंगोली बनाना निश्चित रूप से एक जुनून बन गया है जिसके तहत लोग रंगोली को कुछ खास बनाने के लिए उसकी थीम बनाते हैं। आमतौर पर लड़कियाँ रंगोली को प्रभावशाली बनाने के लिए देवी-देवताओं और अन्य देवताओं के चित्रों के आधार पर थीम बनाती हैं। हालाँकि, आमतौर पर रंगोली का विषय विभिन्न फूलों, अमूर्त डिज़ाइनों, कलश जैसे शुभ चिह्नों और अन्य चीज़ों पर निर्भर करता है।
जैसा कि हम जानते हैं, रंगोली को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और इसलिए इसे दशहरा, गुड़ी पड़वा, नवरात्रि, होली आदि जैसे विभिन्न अवसरों पर बनाया जाता है। रंगोली बनाने के पीछे आम अवधारणा यह है कि हम अपने घर को सजाएँ और अपने जीवन के शुभ अवसरों पर शुभ और अशुभ चीज़ें बनाएँ।