कमाल यह है कि शरीर हमारा, मस्तिष्क हमारा, जीवन हमारा लक्ष्य हमारा लेकिन उसे गाइड करने वाला सामने वाला है. सामने वाला भी वह जो घर से निकलते हुए इ-रिक्शा, बस, मेट्रो, ट्रैन में कुछ मिनटों के लिए साथ होता है.
दूसरों के शब्द और कार्य केवल उनके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब होते हैं । जैसे ही आप किसी बात को दिल पर ले लेते हैं, आप उस व्यक्ति को अपने ऊपर हावी होने की शक्ति दे देते हैं।
एलेनोर रूजवेल्ट के इस कथन को हमेशा याद रखें-"आपकी सहमति के बिना कोई भी आपको हीन महसूस नहीं करा सकता।"
आप ऐसे समझें, एक दिन तो हमें मरना हीं हैं तो क्या हमे इस चिंता में अपने उम्र के बचें दिन गिनना शुरू कर देनी चाहिए कि हमें तो एक दिन मर जाना है. नहीं न?
लेकिन विडम्बना तो यही है कि हम यथार्थ को जानते होने भी कोरी कल्पना या अनावश्यक भ्रम में अपने वर्तमान को ख़त्म कर रहें हैं.
एक न्यूज आता है कि हवाई जहाज से भी बड़ा कहीं से भी एक उल्कापिंड आ सकता है और धरती पर सारी जिंदगी को खत्म कर सकता है। तकनीकी रूप से यह संभव है, लेकिन क्या इसके बारे में सोचते रहना फायदेमंद है?
यह चिंता और सोच-विचार जैसी बेकार की मानसिक आदतों को खत्म कर देता है। किसी बात का सच होना ही फायदेमंद नहीं होता। बहुत से लोग चिंता और सोच-विचार जैसी बेकार की मानसिक आदतों को यह कहकर सही ठहराते हैं कि वे सच हैं (या हो सकती हैं)।

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