नजरिया जीने का: चाणक्य नीति से जानें क्यों जमीन छोड़कर तारे पकड़ने की कोशिश गलत है


आज के इस अनिश्चितता के माहौल में जहाँ हम मोबाइल और इंटरनेट के युग में अच्छी पुस्तकों से पूरी तरह से कट चुके हैं,  चाणक्य और उनकी नीति और भी प्रासंगिक हो गई  है. सुभाषितानि जिसे संस्कृत में लिखी गई  प्राचीन  पुस्तक है, आज के जमाने में सबसे अधिक सरगर्भीत और अनुसरण करने लायक  .पुस्तक है. उसी के सन्दर्भ में श्लोक का व्याख्या आप यहाँ पाएंगे 

संस्कृत: यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते।

ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति चाध्रुवं नष्टमेव हि ॥

जो व्यक्ति अपने हाथ में जो निश्चित (पक्का) है उसे छोड़कर अनिश्चितके पीछे भागता है, उसका निश्चित भी नष्ट हो जाता है और अनिश्चित तो पहले से ही नष्ट है। अर्थ स्पष्ट है कि आप निश्चित को कभी भी अनिश्चित के लिए दावं पर नहीं लगाएं। 

अनिश्चित कभी आपका हो सकता है अर्थात आप जो गेस करते हैं वह सही हो सकता है लेकिन वह भविष्य के गर्भ में हैं और संभावना आधी आधी है उसके सही या गलत होने का. लेकिन उसके  लिए आप निश्चित  दांव पर लगाते हैं तो फिर आप मूर्खता कर रहे  हैं. 

आप इसे ऐसे समझ सकते हैं. 

"क्या आप भी पक्की नौकरी छोड़कर शेयर मार्केट में रातों-रात अमीर बनना चाहते हो? तो चाणक्य की ये बात आपके लिए है!"

"चाणक्य कहते हैं - यो ध्रुवाणि परित्यज्य... जो निश्चित को छोड़ अनिश्चित के पीछे भागता है, उसका सब कुछ नष्ट हो जाता है।"

"जैसे - आपके पास एक अच्छी नौकरी है, 50 हजार महीना आ रहा है। वो निश्चित है। लेकिन आपने Instagram पर देखा कि कोई Crypto से करोड़पति बन गया। आपने नौकरी छोड़ी, सारा पैसा Crypto में लगा दिया। अब क्या हुआ? नौकरी गई, और Crypto भी डूब गया। यही है - ध्रुव भी गया, अध्रुव भी गया।"

"तो करना क्या है? पहले निश्चित  को मजबूत करो। नौकरी को पकड़ो, फिर से अनिश्चित आजमाओ और उसको सार्थक करने का प्रयास करो। जब अनिश्चित आपको लगने लगे की वह निश्चित बन गया है , तब उसे आजमाओ  छोड़ो। चाणक्य नीति यही कहती है - कभी भी जमीन छोड़कर तारे मत पकड़ो।"[

No comments:

Post a Comment