कोणार्क सूर्य मंदिर: जानें इतिहास, महत्व और भी खास बातें


कोणार्क सूर्य मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है बल्कि इंजीनियरिंग और कला का अद्भुत नमूना भी है। मंदिर का आकार एक विशाल रथ जैसा है, जिसमें जटिल नक्काशीदार पत्थर के पहिए, स्तंभ और दीवारें हैं। 

मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम (1238–1264 ई.) ने करवाया था।

इस मंदिर को एक विशाल रथ के रूप में डिजाइन किया गया है, जिसमें 24 पहिए और 7 घोड़े बने हुए हैं।

ये पहिए समय की गति का प्रतीक हैं-सप्त घोड़े सप्ताह के सात दिनों का, और चौबीस पहिए दिन के चौबीस घंटे या वर्ष के बारह महीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं

यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल है।

कोणार्क, पुरी, ओडिशा में स्थित है तथा यह ओडिशा के “स्वर्ण त्रिभुज” (भुवनेश्वर–पुरी–कोणार्क) का हिस्सा है और हर वर्ष फरवरी में आयोजित चंद्रभागा मेला तथा कोणार्क नृत्य महोत्सव के दौरान हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है. 



यूरोपीय नाविक इस मंदिर को काला पैगोडा भी कहते थे। यह मंदिर चंद्रभागा नदी के मुहाने पर बना है। कोणार्क मंदिर अपनी यथार्थवादी कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

पूरा ढांचा लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट से बना है.ऐसी  मान्यता है की यह सूर्य के उगने की दिशा की ओर उन्मुख है ताकि पहली किरण गर्भगृह को स्पर्श करे 

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