जीवन में संतुलन और समझदारी की नितांत जरुरत होती है खास तौर पर तब आप पर परिवार को सँभालने जिम्मेदारी होती है क्योंकि आपकी गंभीरता और समझदारी से हीं परिवार के हितों को देखते हुए सही निर्णय लिया जा सकता है.
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥
विपत्ति के समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए । धन से अधिक रक्षा पत्नी की करनी चाहिए । किन्तु अपनी रक्षा का प्रसन सम्मुख आने पर धन और पत्नी का बलिदान भी करना पड़े तो नहीं चूकना चाहिए ।
अगर आप इस श्लोक का गहन अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि आचार्य चाणक्य ने पैसा के साथ परिवार का महत्व को बताया है जो कि आचार्य के समय के साथ हीं साथ आज भी उतना हीं प्रासंगिक है.
परिवार पर संकट की स्थिति में धन खर्च करने में संकोच नहीं
चाणक्य ने बताया है कि विपत्ति के लिए धन का संचय बहुत जरुरी है क्योंकि विपत्ति एवं आपत्ति कभी भी बता कर नहीं आती है. यह तो लोगों का विशेष तजुर्बा और दीर्घ सोच का असर होता है कि हमें विपत्ति के लिए धन का संचय करते हैं.
वहीँ चाणक्य का साफ कहना है कि विपत्ति के लिए किये गए धन से पत्नी अर्थात परिवार की जानी चाहिए। इसके साथ हीं जब परिवार पर संकट आए, तो धन खर्च करने में संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि पत्नी अर्थात परिवार की सुरक्षा, धन से अधिक मूल्यवान है।

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