छठ पूजा 2025: नहाय खाय के साथ ही आस्था के महापर्व छठ पूजा का आरम्भ, आस्था, शुद्धता और सूर्य देव की आराधना का महापर्व

 


आज अर्थात अक्टूबर 25 से नहाय खाय के साथ ही आस्था के महापर्व छठ पूजा का आरम्भ हो गहा. दरअसल, नहाय खाय उत्सव का पहला दिन होता है जब भक्त छठ पूजा करने के लिए पवित्र होने हेतु डुबकी लगाते हैं। आमतौर पर भक्त अपने घर के पास की नदी/तालाबों में डुबकी लगाना पसंद करते हैं।

छठ पूजा, जो सूर्योपासना का एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है जिसे महापर्व भी कहा जाता है, यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। जहाँ तक छठ पूजा का नियम का सवाल है, यह बहुत हीं कठिन,अनुशाषित और संयम से पूर्ण होता है. छठ पूजा को महापर्व कहा जाता है और इसके लिए काफी संयम और सफाई के साथ अनुशासन को मानना पड़ता है. 

छठ पूजा के मनाने के लिए सबसे जरुरी है कि व्रती को बिलकुल साफ-सुथरे कपड़े पहन कर ही छठ पूजा का प्रसाद बनाना चाहिए। खरना और संध्या अर्ध्य के साथ ही छठ महापर्व के चारों दिन जमीन पर चटाई बिछाकर सोना चाहिए.क्योंकि  छठ पूजा में व्रती का बिस्तर पर सोना वर्जित माना जाता है.इसके साथ हीं व्रती के लिए छठ पूजा के समय बहुत आत्म संयम रखना चाहिए.

छठ पूजा 2025: Date

  • 25 अक्टूबर 2025 (शनिवार) : नहाय-खाय  
  • 26 अक्टूबर 2025 (रविवार)  : लोखंड/ खरना 
  • 27 अक्टूबर 2025 (सोमवार) : संध्याकालीन अर्घ्य
  • 28 अक्टूबर 2025 (मंगलवार):  प्रातःकालीन अर्घ्य
 सायं अर्ध्य  27 अक्टूबर (सोमवार) 2025  को और सुबह का अर्ध्य  28 अक्टूबर (मंगलवार) 2025 को संपन्न होगी. भक्त भगवान सूर्य के लिए प्रसाद तैयार करते हैं। दूसरे और तीसरे दिन को खरना और छठ पूजा कहा जाता है - इन दिनों के दौरान महिलाएं कठिन निर्जला व्रत रखती हैं। आइये जानते हैं छठ पूजा के सभी चरणों जैसे नहाय खाय, खरना, संध्या और उषा अर्ध्य की क्या है विशेषता और महत्त्व. 

नहाय खाय: महत्व 

छठ पूजा का पहला चरण नहाय खाय होता है जिसका प्रकुख उद्देश्य होता है कि व्रती शुद्ध होकर व्रत के लिए तैयार हो जाती है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है जो छठ पूजा का प्रथम चरण कहा जाता है। स्नान के बाद वे साफ कपड़े पहनते हैं। फिर वे फलाहार करते हैं। फलाहार में आमतौर पर फल, दूध, दही, आदि शामिल होते हैं। इस दिन व्रती स्नान करके साफ कपड़े पहनते हैं और फलाहार करते हैं। इस दिन से व्रतियों को 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है।

खरना: महत्व 

छठ पूजा का दूसरा चरण खरना है जो सामान्य पंचांग के अनुसर कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होता है। खरना का दिन एक महत्वपूर्ण दिन है जिसका प्रकुख उद्देध्य प्रतीत होता जो तियों को छठ पूजा के लिए तैयार करता है।खरना के दिन व्रती सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और उपवास शुरू करते हैं। खरना के भोजन में खिचड़ी, गुड़, अरवा चावल, चना, मटर, मूंग, तिल, घी, आदि शामिल होते हैं। खरना के बाद व्रती शाम तक उपवास रखते हैं। यह छठ पूजा के दूसरे दिन का पहला भोजन है जो यह व्रतियों के लिए ऊर्जा का स्रोत माना है। यह व्रतियों को उपवास के लिए तैयार करता है।

खरना के दिन प्रसाद बनाने की परंपरा भी है। प्रसाद में ठेकुआ, पंचामृत, आदि शामिल होते हैं। प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के चूल्हे का उपयोग किया जाता है। प्रसाद को छठी मैया को अर्पित किया जाता है।

संध्या अर्घ्य : महत्व 

छठ पूजा का तीसरा चरण संध्या अर्घ्य है जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को होता है। यह छठ पूजा का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है जिसके अंतर्गत व्रती और परिवार के सभी सदस्य इस दिन व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के लिए व्रती घर के पास नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। अर्घ्य में ठेकुआ, केला, अदरक, वल, गुड़, दूध, फल, आदि शामिल होते हैं जिन्हे भगवन सूर्य को अर्ध्य देने के लिए प्रयोग किया जाता है।

संध्या अर्घ्य  छठ पूजा के तीसरे दिन की सबसे महत्वपूर्ण रस्म है जिसके अंतर्गत मान्यता है कि यह सूर्य भगवान को धन्यवाद देने का अवसर है। कहा जाता है कि डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य देने की यह अनोखी प्ररम्परा है जो छठ में देखने को मिलती है. सामान्यता लोग उगते हुए सूर्य को ही देखना चाहते हैं लेकिन छठ में डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य देने की  परंपरा भी शामिल है. यह व्रतियों की प्रार्थनाओं को सूर्य भगवान तक पहुंचाने का एक तरीका है।

उषा अर्घ्य: महत्व 

छठ पूजा का चौथा और अंतिम चरण उषा अर्घ्य है। यह चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है। इस दिन व्रती सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। उषा अर्घ्य के दिन व्रती सूर्योदय से पहले नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। व्रती एक मिट्टी के बर्तन में चावल, गुड़, दूध, फल, आदि लेकर जाते हैं। व्रती सूर्य भगवान की पूजा करते हैं और उन्हें अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के बाद व्रती फल और मिठाई खाते हैं। उषा अर्घ्य देने के लिए व्रती सूर्योदय से पहले नदी, तालाब या पोखर के किनारे जाते हैं। उषा अर्घ्य देने के बाद व्रती अपना उपवास तोड़ते हैं।

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अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी है जो विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आस्था पर आधारित हैं.ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो कि आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को  पेशेवर सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा सम्बंधित एक्सपर्ट से अवश्य परामर्श करें।





Chhath Puja 2025: इस प्रकार सजाएं अपना छठ घाट कि मंत्रमुग्ध हो जाए हर देखने वाला!


Chhath Puja 2025:  दिवाली के समापन के साथ हीं आस्था के महापर्व अर्थात छठ की तैयारी शुरू होती है। इस  वर्ष अर्थात Chhath 2025 का सांध्यकालीन अर्ध्य  27 अक्टूबर 2025 को तथा अस्ताचलगामी अर्थात डूबते सूर्य को मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025 को अर्घ्य अपर्ण की जाएगी। 

छठ पूजा एक ऐसा पावन पर्व है जिसे भले हीं घर की महिला करती है, लेकिन उसे पूर्ण रूप  से संपन्न करवाने में पूरा परिवार केसदस्यों को लगना पड़ता है। छठ पर्व में जितनी तैयारी घर के अंदर करनी होती  है, इससे भी ज्यादा छठ  घाट के लिए करना होगा हैं जहाँ सूर्य देव और छठी मैया के लिए एक शांत और गहन आध्यात्मिक वातावरण तैयार किया जा सके। जाहिर है कि छठ घाट को सजावट और डेकोरेट करना  भी उतना हीं जरुरी होता है क्योंकि सुबह और शाम का अर्ध्य जो सूरज भगवन को दिया जाता  है,वह छठ घाट पर हीं संपन्न होता है. 


घाट की सजावट में प्रकाश, सादगी और पारंपरिक, प्राकृतिक तत्वों का उपयोग किया जाता है ताकि सूर्य देव और छठी मैया के लिए एक शांत और गहन आध्यात्मिक वातावरण तैयार किया जा सके। ध्यान रखें की छठ पूजा की सामग्री से भरे हुए बांस के सूप (Dala) और दौरा (टोकरी) को खास तौर पर सजाने  के लिए ध्यान दिया जाना चाहिए. इसके लिए इन्हे ढकने के लिए लाल, पीले कपड़े या फूलों से हल्की सजावट की जा सकती है।

छठ घाट की प्रभावशाली और पारंपरिक सजावट के लिए कुछ प्रमुख विचार इस प्रकार हैं:

दीये/मोमबत्तियाँ: यह सबसे ज़रूरी तत्व है। घाट की सीढ़ियों पर, अर्घ्य क्षेत्र के चारों ओर और घाट के किनारों पर जलते हुए मिट्टी के दीयों (दीयों) या छोटी मोमबत्तियों की कतारें लगाएँ। हज़ारों छोटे दीयों की सामूहिक चमक एक मनमोहक, पवित्र और प्रभावशाली छवि बनाती है, खासकर सूर्यास्त (संध्या अर्घ्य) और सूर्योदय (उषा अर्घ्य) के समय।

स्ट्रिंग लाइट्स (फेयरी लाइट्स): आज जबकि दिया का स्थान स्ट्रिंग लाइट और रंगीन लाईट ने  ले लिए है, मुख्य पूजा क्षेत्र, रेलिंग या आस-पास के पेड़ों की सीमा को रेखांकित करने के लिए साधारण, गर्म रंग की स्ट्रिंग लाइट्स (एलईडी फेयरी लाइट्स) का उपयोग करना ज्यादा सही होगा. खासतौर पर रात  के  अंध्रेरे में लाईट की जगमगाहट छठ घाट  की सजावट में चार चाँद लगा देता है।  

 फूलों की सजावट:  गेंदे के फूल, और फूलों की पंखुड़ियों की रंगोली से भी घाट   सजाना अच्छा लगता है. आखिर बगैर फूल के सजावट की कल्पना  भी कैसे की जा सकती है. घाट के प्रवेश द्वार पर तोरण बनाकर या पानी की ओर जाने वाले रास्ते के किनारों को सजाने के लिए गेंदे की लंबी लड़ियों का इस्तेमाल करें। त्योहार की पर्यावरण-अनुकूल भावना को ध्यान में रखते हुए, कृत्रिम रंगों के बजाय ताज़ी फूलों की पंखुड़ियों (विशेषकर गेंदा, गुलाब और कमल की पंखुड़ियों) का उपयोग करके अर्घ्य क्षेत्र के पास ज़मीन पर बड़ी, जीवंत रंगोली बनाएँ।

केले के पेड़ के डंठल: केला के फल  उसके पते और पेड़ को भी हिंदू सभ्यता  संस्कृति में शुभ माना जाता है. इसके अतिरिक्त केला को समृद्धि के प्रतीक और पवित्र स्थान को चिह्नित करने के लिए उसके प्रयोग किया  है. छठ घाट की सजावट पारंपरिक रूप से केले के पेड़ के डंठलों को अर्घ्य क्षेत्र के किनारों पर रखा जाता है।

 व्यवस्थित अर्पण क्षेत्र: सूप (टोकरियाँ) की व्यवस्था: प्रसाद को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित करने से सबसे सुंदर छवि बनती है। अर्घ्य से पहले पानी के किनारे फलों, ठेकुआ, गन्ने और दीयों से भरी सजी हुई बाँस की टोकरियाँ (सूप या दौरा) व्यवस्थित करें, और उन्हें साफ-सुथरे और पारंपरिक तरीके से रखें।

प्रभावशाली छवि के लिए सुझाव:स्वच्छता और व्यवस्था: छठ घाट का सबसे प्रभावशाली पहलू उसकी पवित्रता और स्वच्छता है। सुनिश्चित करें कि क्षेत्र की सावधानीपूर्वक सफाई की गई हो और सभी सजावट व्यवस्थित रूप से की गई हो।

प्राकृतिक तत्वों पर ध्यान दें: चूँकि छठ प्रकृति (सूर्य, जल और पृथ्वी) को समर्पित एक त्योहार है, इसलिए प्लास्टिक या कृत्रिम सामग्रियों की बजाय बायोडिग्रेडेबल और प्राकृतिक सजावट (फूल, मिट्टी के दीये, गन्ना, फल) को प्राथमिकता दें।

शुभ रंगों का प्रयोग करें: त्योहार से जुड़े पारंपरिक, चमकीले रंगों, जैसे पीला, लाल और नारंगी, जो सूर्य और शुभता के प्रतीक हैं, को कपड़ों, फूलों और रंगोली के माध्यम से शामिल करें।

छठ पूजा 2025: इन डिज़ाइन की मदद से बनाएं खास रंगोली स्वास्तिक, कमल का फूल, मोर आदि

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छठ पूजा 2025: भारत त्योहारों का देश है और यहाँ के हर खास आयोजन और तैयारियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है रंगोली का निर्माण। जी हाँ, रंगोली का धार्मिक महत्व है और यह देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए बनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि यह बुरी आत्माओं को दूर रखता है और सद्भाव को बढ़ावा देता है। रंगोली बनाने के लिए हालाँकि अनगिनत डिज़ाइन हो सकते हैं लेकिन आप खास तौर पर लक्ष्मी जी के पद चिन्ह, स्वास्तिक, कमल का फूल:,मोर:आदि को रंगोली में स्थान दे सकते हैं जिन्हे काफी शुभ और  घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है. 

रंगोली बनाने से कलात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा मिलता है और समुदाय एक साथ आते हैं। इसका उपयोग पूजा कक्षों और मंदिरों में प्रसाद के रूप में भी किया जाता है, जिससे आध्यात्मिक वातावरण बढ़ता है।

इस दिन लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करके, रंगोली बनाकर, दीये जलाकर और मिठाई खाकर इस त्योहार को मनाते हैं।

दीपावली में रंगोली बनाने का विशेष महत्व है। रंगोली को हिंदू धर्म में शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि रंगोली बनाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मां लक्ष्मी का आगमन होता है। रंगोली बनाने से घर की सुंदरता भी बढ़ जाती है।

आप पारंपरिक चौथाई आकार के बजाय इस सरल अर्ध-वृत्त रंगोली पैटर्न का उपयोग कर सकते हैं। कोने में एक मध्यम आकार की उर्ली कटोरी स्थापित करने के बाद, कटोरी के चारों ओर आधा गोलाकार रंगोली बनाएं। डिज़ाइन को पूरा करने के लिए, रंगोली को भरने के लिए फूलों और पंखुड़ियों के बीच पत्तियां डालें।

दीपावली में रंगोली के कई प्रकार बनाए जाते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख प्रकार हैं:

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लक्ष्मी जी के पद चिन्ह: 

यह रंगोली सबसे लोकप्रिय रंगोली है। इसमें मां लक्ष्मी के पद चिन्ह बनाए जाते हैं।

स्वास्तिक: 

स्वास्तिक एक शुभ प्रतीक है। इसे रंगोली में बनाने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती 

कमल का फूल: 

कमल का फूल शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है। इसे रंगोली में बनाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

मोर:

 मोर को सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है। इसे रंगोली में बनाने से घर की सुंदरता बढ़ जाती है।

रंगोली बनाने के तरीके

रंगोली बनाने के लिए सबसे पहले एक साफ-सुथरा स्थान चुनें। फिर उस स्थान को रंगोली बनाने के लिए तैयार कर लें। इसके लिए आप उस स्थान पर चावल का आटा या गोबर का घोल लगा सकते हैं।

रंगोली बनाने के लिए आपको रंगों की आवश्यकता होगी। आप अपनी पसंद के रंगों का उपयोग कर सकते हैं। रंगोली बनाने के लिए आप सूखे रंगों का उपयोग कर सकते हैं या फिर रंगोली पाउडर का उपयोग कर सकते हैं।

रंगोली बनाने के लिए सबसे पहले एक सरल डिजाइन चुनें। फिर उस डिजाइन को उस स्थान पर बनाएं जिस स्थान पर आप रंगोली बनाना चाहते हैं। आप अपनी पसंद के अनुसार डिजाइन में बदलाव भी कर सकते हैं।

रंगोली बनाने के लिए आप एक रंगोली बनाने की स्टेंसिल का उपयोग भी कर सकते हैं। स्टेंसिल का उपयोग करने से आपको रंगोली बनाने में आसानी होगी।

रंगोली बनाने के बाद उसे सुखाने दें। फिर उस स्थान पर दीये जलाएं।

सुंदर रंगोली बनाने के कुछ टिप्स

  • रंगोली बनाने के लिए हमेशा साफ-सुथरे रंगों का उपयोग करें।
  • रंगोली बनाते समय सावधानी बरतें कि रंगोली में कोई गड़बड़ी न हो।
  • रंगोली बनाते समय अपनी कल्पना का उपयोग करें और कुछ अलग और आकर्षक डिजाइन बनाएं।
  • रंगोली बनाते समय समय का ध्यान रखें और उसे जल्दी-जल्दी न बनाएं।

रंगोली बनाने के लिए क्या सामग्री चाहिए?

सामान्य रूप से रंगोली बनाने की प्रमुख सामग्री है- पिसे हुए चावल का घोल, सुखाए हुए पत्तों के पाउडर से बनाया रंग, चारकोल, जलाई हुई मिट्टी, लकड़ी का बुरादा आदि। रंगोली का तीसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व पृष्ठभूमि है। रंगोली की पृष्ठभूमि के लिए साफ़ या लीपी हुई ज़मीन या दीवार का प्रयोग किया जाता है।

Chhath 2025@ रंगोली डिज़ाइन: भारतीय संस्कृति की रंगीन पहचान और शुभता का प्रतीक


Chhath 2025: त्योहारों के मौसम में रंगोली हमारे घर की सजावट का एक अहम हिस्सा है। दरअसल, रंगोली सिर्फ़ सजावट का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसे सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। रंगोली एक प्राचीन कला है जिसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और लगभग सभी घरों में त्योहारों के उत्सव के रूप में इसका पालन किया जाता है। 
यहाँ हम रंगोली बनाने की सभी नवीनतम और अपडेटेड तरकीबें बता रहे हैं, जिनमें छोटी रंगोली, दिवाली के लिए सरल रंगोली डिज़ाइन, मोर रंगोली, मोर रंगोली, लक्ष्मी पदचिन्ह रंगोली शामिल हैं, जो आपकी दिवाली के उत्सव में और भी रंग भर देंगी।


भारतीय संस्कृति और रंगोली

रंगोली को तमिलनाडु में कोलम, पश्चिम बंगाल में अल्पना, आंध्र प्रदेश में मुग्गू आदि नामों से जाना जाता है।हर रंगोली डिज़ाइन अपनी आकृति और रंगों में भारतीय परंपरा की गहराई और संस्कृति की सुंदरता को संजोए हुए होता है। यह न केवल सौंदर्य और कला का प्रतीक है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा, खुशहाली और समृद्धि का भी द्योतक माना जाता है। रंगोली के रंग हमारे जीवन में उल्लास भरते हैं और देवी लक्ष्मी का स्वागत करने का शुभ संकेत देते हैं। हर रंगोली डिज़ाइन अपनी आकृति और रंगों में भारतीय परंपरा की गहराई और संस्कृति की सुंदरता को संजोए हुए होता है।

दिवाली रंगोली

आमतौर पर हम दिवाली का त्यौहार धन और पैसे की देवी मानी जाने वाली देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए मनाते हैं। रंगोली बनाना भी देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए सजावट का एक हिस्सा है। इसीलिए घर के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाई जाती है ताकि सकारात्मक ऊर्जा के साथ प्रभावशाली रूप मिले और देवी लक्ष्मी का स्वागत भी हो। ऐसा माना जाता है।

रंगोली बनाना

रंगोली आमतौर पर चावल के पाउडर और चाक से बनाई जाती है, हालाँकि आजकल बाज़ार में कई तरह के रंग उपलब्ध हैं, जिससे रंगोली बनाने वालों को असीमित रंगों के साथ एक अनूठी थीम के साथ रंगोली बनाने की आज़ादी मिलती है।


रंगोली बनाने के आसान तरीके

रंगोली बनाना इस बात पर निर्भर करता है कि आपने रंगोली के लिए कौन सी थीम चुनी है। हालाँकि, रंगोली विभिन्न रंगों का मिश्रण होती है और अपनी डिज़ाइन के कारण प्रभावशाली दिखती है... लेकिन आजकल रंगोली बनाना युवा लड़कियों के लिए एक जुनून बन गया है।

रंगोली के पारंपरिक डिज़ाइन

रंगोली बनाना निश्चित रूप से एक जुनून बन गया है जिसके तहत लोग रंगोली को कुछ खास बनाने के लिए उसकी थीम बनाते हैं। आमतौर पर लड़कियाँ रंगोली को प्रभावशाली बनाने के लिए देवी-देवताओं और अन्य देवताओं के चित्रों के आधार पर थीम बनाती हैं। हालाँकि, आमतौर पर रंगोली का विषय विभिन्न फूलों, अमूर्त डिज़ाइनों, कलश जैसे शुभ चिह्नों और अन्य चीज़ों पर निर्भर करता है।

जैसा कि हम जानते हैं, रंगोली को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और इसलिए इसे दशहरा, गुड़ी पड़वा, नवरात्रि, होली आदि जैसे विभिन्न अवसरों पर बनाया जाता है। रंगोली बनाने के पीछे आम अवधारणा यह है कि हम अपने घर को सजाएँ और अपने जीवन के शुभ अवसरों पर शुभ और अशुभ चीज़ें बनाएँ।

Diwali 2025 Laxmi Puja : माँ लक्ष्मी विधि और आरती


माँ लक्ष्मी को समृद्धि, धन, और सुख-शांर्त की देवी माना जाता हैं और आज शुभ दीपावली के अवसर पर माँ लक्ष्मी और भगवन गणेश का पूजन किया जाता है. 

मााँ लक्ष्मी की आराधना विशेष तौर पर  धनतेरस से लेकर दीपावली को भी किया जाता है क्योंकि हिन्दू पञ्चाङ्ग के अनुसार धनतेरस और दिवाली के अवसर पर धन और वेल्थ की कामना को ध्यान में रखकर मां लक्ष्मी के  पूजन से लक्ष्मी  का वास होता है साथ ही घर मेंसुख-शांति बनी रहती है, और जीवन में समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पूजा की विधि 

  • माँ लक्ष्मी की पूजन के लिए कुछ तैयारियों का किया जाना जरुरी है. इसके लिए आप आप इन नियमों का पालन किया जाना चाहिए-
  • स्वच्छता बनाए रखें: पूजा स्थल को स्वच्छ करें और एक कपडा बिछा कर सुन्दर माहौल बनाएं. 
  • स्नान और वस्त्र: दिवाली के दिन साफ़ सुथरा घर और माहौल बनाकर पूजा के पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • गणेश पूजन: सबसे पहले भगवन गणेश की पूजा कर व्रत का संकल्प लें।
  • माँ लक्ष्मी की पूजा: दिवाली के दिन के लिए खास तौर पर लाए गए माँ लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति पर फू ल, दीपक, और भोग अर्पित करें ।
  •  माँ लक्ष्मी की पुजन के लिए उपयुक्त पुस्तक का पाठ  करें ।
  • आरती दीपक जलाकर मााँ लक्ष्मी की आरती करें और दीपक को चारों र्दशाओं में घुमाएं ।
  •  मााँ लक्ष्मी से धन, सुख, और समृद्धि प्राप्त करें ।

माँ लक्ष्मी की आरती 

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता.

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।

सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।

जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।

कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।

सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।

खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।

उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥


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अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में उल्लिखित टिप्स/सुझाव केवल सामान्य जानकारी है जो विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आस्था पर आधारित हैं.ताकि आपको उस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो कि आम लोगों से अपेक्षित है. आपसे निवेदन है कि कृपया इन सुझावो को  पेशेवर सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए तथा अगर आपके पास इन विषयों से सम्बंधित कोई विशिष्ट प्रश्न हैं तो हमेशा सम्बंधित एक्सपर्ट से अवश्य परामर्श करें।


खजुराहो: प्रेम, कला और संस्कृति का अनोखा संगम-महत्त्व, इतिहास, विशेषता


भारत की धरोहरें विश्वभर में अपनी भव्यता और कला-कौशल के लिए जानी जाती हैं और इसमें किसी को संदेह नहीं होनी चाहिए. उन्हीं में से एक है खजुराहो जो  अपनी अद्वितीय मूर्तिकला, मंदिरों की सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है. 

खजुराहो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है. खजुराहो के मंदिरों का निर्माण चंदेल राजवंश के दौरान हुआ था, जो 950 और 1050 के बीच अपने चरमोत्कर्ष पर था। अब केवल लगभग 20 मंदिर ही बचे हैं; ये तीन अलग-अलग समूहों में आते हैं और दो अलग-अलग धर्मों - हिंदू धर्म और जैन धर्म - से संबंधित हैं। 

खजुराहो  अपनी नागर शैली की वास्तुकला और कामुक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है.  इन्हें पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी समूहों में विभाजित किया गया है, जिनमें महादेव मंदिर जैसे प्रसिद्ध मंदिर शामिल हैं. 

ये मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला के बीच एक आदर्श संतुलन बनाते हैं।

खजुराहो समूह: संक्षिप्त तथ्य

  • 10वीं और 11वीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर शासन करने वाले चंदेल राजवंश की भारतीय मंदिर कला और वास्तुकला।
  • 1986 में यूनेस्को ने खजुराहो को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया।
  • 6 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले सुरम्य परिदृश्य में, 23 मंदिर (जिनमें एक आंशिक रूप से उत्खनित संरचना भी शामिल है) खजुराहो स्मारक समूह के पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी समूहों का निर्माण करते हैं।
  • खजुराहो को प्राचीन काल में 'खजूरपुरा' और 'खजूर वाहिका' के नाम से भी जाना जाता था।
  • खजुराहो का मतलब संस्कृत शब्द 'खर्जुरावाहक' से है, जिसका अर्थ है खजूर ले जाने वाला या खजूर के पेड़ों वाला. 
  • यह स्मारक समूह यूनेस्को विश्व धरोहर में भारत का एक धरोहर क्षेत्र गिना जाता है।
  • मंदिर नागर शैली में बने हैं, जिनमें ऊँचे शिखर और जटिल नक्काशी देखने को मिलती है। 
  • मंदिरों की मूर्तियों में प्रेम और यौन कला को भी बहुत सुंदर ढंग से दिखाया गया है।
छतरपुर मध्य प्रदेश राज्य की उत्तर पूर्वी सीमा में स्थित है यहाँ पर अन्य पर्यटक स्थल भी स्थित है जिनमें शामिल है-

  • चित्रगुप्त मंदिर
  • चौंसठ योगिनी
  • कंदरिया महादेव
  • लक्ष्मण मंदिर
  • चतुर्भुज मंदिर

जानिए अक्टूबर में जन्मे लोगों का स्वभाव – तर्कशक्ति, संवेदनशीलता और रचनात्मकता का संगम


अक्टूबर में जन्मे लोग: अक्टूबर महीने में जन्मे लोग कई अनोखे गुणों से युक्त होते हैं जो उन्हें दूसरों से अलग बनाते हैं। अक्टूबर में जन्मे लोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि  इन्हें किसी भी प्रकार की कला, संगीत, चित्रकला, अभिनय, नृत्य आदि से बहुत लगाव होता है। अक्टूबर महीने में जन्मे लोग विविधताओं से भरे होते हैं और ऐसे लोग जीवन में संवेदनशील होते हैं, ये जीवन को बहुत व्यवस्थित और अनुशासन के साथ जीना पसंद करते हैं। 

अगर आप अक्टूबर में जन्मे लोगों की जीवनशैली का अध्ययन करें, तो आप पाएंगे कि ये भाषा के प्रति बहुत गंभीर होने के साथ-साथ तर्क-शक्ति से भी परिपूर्ण होते हैं। अक्टूबर में जन्मे लोगों को कला से विशेष प्रेम होता है और साथ ही ये अपने जीवन में नैतिक सिद्धांतों और आदर्शवाद में दृढ़ विश्वास रखते हैं। धन-संपत्ति के मामले में ये चीजें इनके लिए ज़्यादा मायने नहीं रखतीं। आइए देखें कि प्रसिद्ध ज्योतिषी, अंकशास्त्री और राशिफल विशेषज्ञ हिमांशु रंजन शेखर द्वारा बताई गई इन लोगों की विशेषताएँ, गुण और भविष्यवाणी क्या हैं।

कला के दीवाने

अक्टूबर महीने में जन्मे लोग कला यात्राओं के प्रति बहुत गंभीर होते हैं और इन्हें किसी भी प्रकार की कला या कलात्मक चीज़ों का बहुत शौक होता है। चाहे वह संगीत हो, चित्रकला हो या शिल्पकला, जीवन में सभी प्रकार की कलात्मक चीज़ों को बहुत महत्व दिया जाता है। ऐसे लोग स्वयं भी किसी न किसी प्रकार की कला को अपने शौक के रूप में अपनाते हैं। वे अपने जीवन में कला को हर तरह से, चाहे वह पर्यावरण हो, परिवार हो या आसपास का वातावरण, बहुत महत्व देते हैं।

रहस्यमय विषयों में रुचि

अक्टूबर महीने में जन्मे लोग अध्यात्म/दार्शनिक/ज्योतिष/आदि सहित रहस्यमय विषयों के शौकीन होते हैं। ऐसे लोग रहस्यमय और गूढ़ विषयों का अध्ययन करते हैं और अक्सर इन रहस्यमय विषयों का अनुसरण करते हैं और उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं।

शांत स्वभाव

अक्टूबर महीने में जन्मे लोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने जीवन में बहुत गंभीर होते हैं। आमतौर पर वे जीवन में आने वाली परेशानियों या उपद्रवी स्थितियों से बचना चाहते हैं या खुद को उनसे अप्रभावित रखना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि जीवन में प्रगति के लिए शांति ही एकमात्र सही रास्ता है और वे आमतौर पर आंतरिक और बाहरी परिस्थितियों का सामना शांति और गंभीरता से करते हैं या ऐसी किसी भी चीज़ से बचते हैं जो उन्हें असंतुलित करती है या प्रभावित करती है।

संवेदनशील और गंभीर स्वभाव

अक्टूबर माह में जन्मे लोग आमतौर पर बहुत संवेदनशील और गंभीर स्वभाव के होते हैं जो इन्हे जीवन में खास और अलग बनाती है. ऐसे लोगों के लिए संवेदनशीलता या गंभीरता उनकी कमज़ोरी नहीं बल्कि जीवन में आगे बढ़ने का हथियार है। ऐसा नहीं है कि वे अपने, अपने परिवार या खुद के आस-पास की उथल-पुथल या प्रतिकूल परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, बल्कि सच तो यह है कि वे गंभीरता से इन परिस्थितियों से बाहर निकलने का विकल्प और रास्ता ढूँढ़ते हैं और मिस्टर कूल की तरह सोचते हैं।

मज़बूत तर्कशक्ति

अक्टूबर माह में जन्मे लोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें मज़बूत तर्कशक्ति और समझाने की शक्ति होती है। वे आसानी से दूसरे विचारों या विचारधारा से प्रभावित नहीं होते और वे किसी भी विचारधारा को जल्दबाज़ी में आसानी से नहीं अपनाते। उनके सामने आने वाले किसी भी सिद्धांत या विचारधारा को वे अपनी तार्किकता के तराजू पर तौलते हैं और संतुष्ट होने के बाद ही उसे अपने जीवन में अपनाते हैं। लेकिन सच यह भी है कि एक बार वह किसी सिद्धांत या विचारधारा से प्रभावित हो जाए तो उसके लिए सब कुछ छोड़ देता है।

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अस्वीकरण: कृपया ध्यान दें कि लेख में बताए गए सुझाव/सुझाव केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से हैं ताकि आपको इस मुद्दे के बारे में अपडेट रखा जा सके जो आम लोगों से अपेक्षित है और इन्हें पेशेवर सलाह के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए/पालन नहीं किया जाना चाहिए। हम अनुशंसा करते हैं और आपसे अनुरोध करते हैं कि यदि आपके पास एस्ट्रोलॉजी संबंधित विषय से के बारे मे कोई विशिष्ट प्रश्न हैं, तो हमेशा अपने पेशेवर सेवा प्रदाता से परामर्श करें।



Karwa Chauth Sargi: क्या होता है सरगी, इसे कौन देता है, क्या और कब खाना चाहिए- जानें सब कुछ

Importance of sargi in Karwa chauth

Karwa Chauth Sargi: वैदिक पंचांग के अनुसार, करवा चौथ का व्रत हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है.करवा चौथ का व्रत त्योहार सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है, जिसके लिए वे खास तैयारी करती है और इसके इन्तजार भी करती हैं. पति को दीर्घायु, स्वास्थ्य और खुशहाली रखने के लिए सभी सुहागिन महिलाएं इस दिन  को निर्जला व्रत रखती हैं और रात में चांद के दर्शन के बाद व्रत का पारण करती हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत से  मिलती है और वैवाहिक जीवन गहराई और प्रेम बना रहता है.

क्या होता है सरगी? 

इस व्रत का एक प्रमुख पड़ाव होता है जिसे सरगी के नाम से जाना जाता है. क्योंकि करवाचौथ वाले दिन एक स्त्री पूरा दिन निर्जला व्रत रखना पड़ता है इसलिए सरगी से व्रत का आरम्भ होता है. 

सरगी (सरगी थाली) सास की तरफ से अपनी बहू के लिए प्यार और आशीर्वाद का प्रतीक है। करवा चौथ की सरगी व्रत से पहले सुबह का विशेष भोजन शुरू हो जाता है। यह थाली सास द्वारा तैयार की जाती है और बहू को दी जाती है.  यह थाली सास द्वारा तैयार की जाती है और बहू को दी जाती है ताकि दोनों साथ मिलकर इसे खा सकें और व्रत की शुरुआत खुशी और प्यार के साथ कर सकें।

सरगी (सरगी थाली) सास की तरफ से अपनी बहू के लिए प्यार और आशीर्वाद का प्रतीक है। करवा चौथ की सरगी व्रत से पहले सुबह का विशेष भोजन शुरू हो जाता है।

सरगी क्या चीज होती है, करवा चौथ की सरगी कौन देता है, सरगी खाने के बाद क्या करना चाहिए, और करवा चौथ के दिन सरगी में क्या क्या खाना चाहिए आदि सभी सवालों के जवाब आप यहाँ प्राप्त कर सकते हैं.

सामान्यत: ऐसा माना जाता है की सरगी सास के द्वारा दी जाती है. लेकिन कई परिवारों में जब सास न हो तो घर की दूसरी बड़ी महिलाएं जैसे बड़ी ननद या जेठानी भी सरगी देती है.क्योकि करवा चौथ  दिन महिलाएं निर्जला व्रत करती है इसलिए सरगी लेने का सही समय करवा चौथ के दिन सूरज निकलने से पहले सुबह तीन से चार बजे के आस-पास महिलाएं सरगी लेती हैं.

करवा चौथ के व्रत में सरगी का विशेष महत्व होता है। सरगी एक प्रकार की रस्म होती है जिसमें सास अपनी बहू को सुहाग का सामान, फल, ड्राय फ्रूट्स और मिठाई देखकर सुखी वैवाहिक जीवन जीने का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। परंपरा के अनुसार, सरगी में रखे व्यंजनों को ग्रहण करके ही इस व्रत का शुभारंभ किया जाता है। यदि किसी महिला की सास ना हो तो यह रसम उसकी जेठानी या फिर बहन भी कर सकती है।

सरगी का महत्व निम्नलिखित है:

  • यह व्रत की शुरुआत का संकेत है। सरगी खाने के बाद ही महिलाएं व्रत शुरू करती हैं।
  • यह व्रत के लिए ऊर्जा प्रदान करती है। सरगी में पौष्टिक और आसानी से पचने वाले व्यंजन होते हैं जो व्रतियों को पूरे दिन ऊर्जावान बनाए रखते हैं।
  • यह सुहाग का प्रतीक है। सरगी में सुहाग का सामान होता है जो व्रतियों को सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देता है।

करवा चौथ की सरगी में आमतौर पर निम्नलिखित चीजें शामिल होती हैं:

  • फल और सब्जियां: आम, केला, जामुन, अंगूर, सेब, गाजर, मूली, खीरा, आदि।
  • ड्रायफ्रूट्स: बादाम, काजू, किशमिश, अंजीर, आदि।
  • मिठाइयां: गुलाब जामुन, लड्डू, मिठाई, आदि।
  • सुहाग का सामान: चूड़ी, बिंदी, मेहंदी, सिंदूर, इत्र, आदि।

करवा चौथ की सरगी को सूर्योदय से पहले ग्रहण करना चाहिए। इसे ग्रहण करने के लिए महिलाएं हाथों में पानी लेकर सरगी की थाली को अपने सिर पर रखती हैं और सास से आशीर्वाद लेती हैं। फिर, वे थाली में रखे व्यंजनों को ग्रहण करती हैं।

FAQs

करवा चौथ की सरगी कौन देता है?

सामान्यत: ऐसा माना जाता है की सरगी सास के द्वारा दी जाती है. लेकिन कई परिवारों में जब सास न हो तो घर की दूसरी बड़ी महिलाएं जैसे बड़ी ननद या जेठानी भी सरगी देती है

सरगी क्या चीज होती है?

यह व्रत की शुरुआत का संकेत है। सरगी खाने के बाद ही महिलाएं व्रत शुरू करती हैं।

करवा चौथ के दिन सरगी में क्या क्या खाना चाहिए?

आप इन चीजों का सरगी के रूप में ले सकते हैं जैसे फल और सब्जियां-आम, केला, जामुन, अंगूर, सेब, गाजर, मूली, खीरा, बादाम, काजू, किशमिश, अंजीर, गुलाब जामुन, लड्डू, मिठाई, आदि।


75 वेटलैंड बर्ड्स सैंक्चुअरी : रामसर स्‍थलों की सूची में 11 और आर्द्रभूमि जुड़ीं, पाएं विस्तृत जानकारी


Wetlands Birds Sanctuaries Ramsar List

एक और जहाँ देश स्वतंत्रता के 75वें वर्ष  मना रहा है ऐसे में भारत के लिए  और  उपलब्धि हासिल हुई है जहाँ 75 रामसर स्थलों को बनाने के लिए रामसर स्‍थलों की सूची में 11 और आर्द्रभूमि शामिल हो गई हैं। 11 नए स्‍थलों में तमिलनाडु में चार (4), ओडिशा में तीन (3), जम्मू और कश्मीर में दो (2) और मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र प्रत्‍येक में एक (1) शामिल हैं।

भारत में स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में देश में 13,26,677 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हुए कुल 75 रामसर स्थलों को बनाने के लिए रामसर स्‍थलों की सूची में 11 और आर्द्रभूमि शामिल हो गई हैं।



11 नए स्‍थलों में तमिलनाडु में चार (4), ओडिशा में तीन (3), जम्मू और कश्मीर में दो (2) और मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र प्रत्‍येक में एक (1) शामिल हैं। इन स्थलों को नामित करने से इन आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन तथा इनके संसाधनों के कौशलपूर्ण रूप से उपयोग करने में सहायता मिलेगी।
1971 में ईरान के रामसर में रामसर संधि पत्र पर हस्ताक्षर के अनुबंध करने वाले पक्षों में से भारत एक है। भारत ने 1 फरवरी, 1982 को इस पर हस्ताक्षर किए। 1982 से 2013 के दौरान, रामसर स्‍थलों की सूची में कुल 26 स्‍थलों को जोड़ा गया, हालांकि, इस दौरान 2014 से 2022 तक, देश ने रामसर स्थलों की सूची में 49 नई आर्द्रभूमि जोड़ी हैं।
 वर्ष (2022) के दौरान ही कुल 28 स्थलों को रामसर स्थल घोषित किया गया है। रामसर प्रमाण पत्र में अंकित स्‍थल की तिथि के आधार पर इस वर्ष (2022) के लिए 19 स्‍थल और पिछले वर्ष (2021) के लिए 14 स्‍थल हैं।

तमिलनाडु में अधिकतम संख्या है। रामसर स्थलों की संख्या (14), इसके पश्‍चात उत्‍तर प्रदेश में रामसर के 10 स्थल हैं। 
रामसर स्थलों के रूप में नामित 11 आर्द्रभूमियों का संक्षिप्त विवरण
आद्रभूमि का नाम-राज्‍य
  1. तंपारा झील-ओडिशा
  2. हीराकुंड जलाशय-ओडिशा
  3. अंशुपा झील-ओडिशा
  4. यशवंत सागर-मध्‍य प्रदेश
  5. चित्रांगुडी पक्षी अभ्यारण्य-तमिलनाडु
  6. सुचिन्द्रम थेरूर वेटलैंड कॉम्प्लेक्स-तमिलनाडु
  7. वडुवूर पक्षी अभयारण्य-तमिलनाडु
  8. कांजीरकुलम पक्षी अभयारण्य-तमिलनाडु
  9. ठाणे क्रीक-महाराष्‍ट्र
  10. हाइगम वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व-जम्‍मू और कश्‍मीर
  11. शालबुग वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व-जम्‍मू और कश्‍मीर

 

Point Of View करवा चौथ: जाने कैसे बनाएं पत्नी के करवाचौथ को रोमांटिक और यादगार




Point Of View :करवा चौथ उन जोड़ों के लिए एक खास दिन है, खासकर उन विवाहित महिलाओं के लिए जो अपने पति की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस त्योहार से जुड़ी रस्में और परंपराएँ प्रेम, भक्ति और प्रतिबद्धता से ओतप्रोत हैं।   करवा चौथ सुहगिनो का एक प्रमुख त्यौहार है और इसके लिए प्रत्येक सुहागन कई दिनों के पहले से ही इंतजार करती है। न केवल इस त्यौहार को मनाने के लिए बल्कि पत्नियों के लिए इस पर्व का प्रत्येक मोमेंट खास होता है चाहे वह पूजा हो या फिर  सजने सवरने की तैयारी तक, सब कुछ बहुत खास होता है ।  

करवा चौथ एक हिंदू त्योहार है जो विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए मनाती हैं। करवाचौथ वाले दिन एक स्त्री पूरा दिन निर्जला व्रत करके अपने पति की लंबी आयु व उसके बेहतर स्वास्थ्य की कामना करती है। वैसे तो हर स्त्री के लियें ये व्रत महत्वपूर्ण है लेकिन लेकिन अगर शादी के बाद पहला करवा चौथ हो तो फिर बात ही कुछ और है। जब एक नई दुल्हन पूरा शृंगार करके तैयार होती है और पति के लिए सजती संवारती है वो उसके लियें बहुत खास होता है ।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने पत्नी को बताएं कि आप उसे कितना प्यार करते हैं और उसकी कितनी परवाह करते हैं। करवा चौथ एक ऐसा दिन है जब आप अपने प्यार को व्यक्त कर सकते हैं और अपने रिश्ते को मजबूत कर सकते हैं।

करवा चौथ को यादगार बनाने के लिए कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:

प्रेम और सम्मान दिखाएं: करवा चौथ एक प्रेम और सम्मान का त्योहार है। अपने पत्नी को बताएं कि आप उसे कितना प्यार करते हैं और उसकी कितनी परवाह करते हैं। उसे एक उपहार दें, उसे एक प्यारा सा संदेश लिखें, या उसके लिए कुछ खास करें।

व्रत को आसान बनाएं: करवा चौथ एक कठिन व्रत हो सकता है, खासकर अगर आप पहली बार मना रही हों। अपने पत्नी को व्रत रखने में मदद करने के लिए कुछ कदम उठाएं। उदाहरण के लिए, आप उसे सुबह नाश्ता बना सकते हैं, उसके लिए पानी का ध्यान रख सकते हैं, या शाम को उसे व्रत तोड़ने में मदद कर सकते हैं।

एक रोमांटिक रात बनाएं: करवा चौथ एक विशेष दिन है, इसलिए इसे एक रोमांटिक रात के साथ समाप्त करें। एक साथ डिनर करें, एक फिल्म देखें, या बस बात करें और एक-दूसरे के साथ समय बिताएं।

यहां कुछ विशिष्ट विचार दिए गए हैं जो आप अपने पत्नी के करवा चौथ को यादगार बनाने के लिए कर सकते हैं:

  • उसके लिए एक खूबसूरत साड़ी या लहंगा खरीदें।
  • उसे एक खूबसूरत सा हार या झुमके दें।
  • उसके लिए एक प्रेम पत्र लिखें।
  • उसके लिए एक रोमांटिक डिनर का प्लान बनाएं।
  • उसके लिए एक कैंडल लाइट डिनर का आयोजन करें।
  • उसके लिए एक सरप्राइज पार्टी का आयोजन करें।


करवा चौथ 2025 टिप्स : उपवास के दौरान भी जाने कैसे बहाल रखें अपने चेहरे की चमक


करवा चौथ 2025:
कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 09 अक्टूबर की रात 10:54 बजे से शुरू होगी और 10 अक्टूबर की शाम 7:38 बजे इसका समापन होगा करवा चौथ का त्योहार सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है, जिसमें महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए निर्जला व्रत रखती हैं.  हिन्दू पंचांग के अनुसार करवा चौथ  कार्तिक मास की चतुर्थी को मनाया जाता है।  इस दिन विवाहित महिलाएं अपने जीवन साथी अर्थात सुहाग के लम्बी उम्र और सभी प्रकार की सलामती के लिए व्रत रखती हैं।  हालांकि इस दिन का धार्मिक और भावनात्मक महत्व बहुत गहरा है और जाहिर  है कि प्रत्येक  पति और पत्नी के लिए  दिन बेहद खास होता है. लेकिन पत्नी द्वारा किये जाने वाले उपवास और थकान के कारण उनकी चेहरे की चमक का फीकी पड़ना आम बात है।और आपको यह पता होना चाहिए कि करवा चौथ के अवसर पर आपके खूबसूरत चेहरे पर चमक और खुशी लाने के लिए जरुरी है कि उपवास से होने वाले परेशानियों जैसे  एसिडिटी, जी मिचलाना, लो ब्लड प्रेशर और लो एनर्जी आदि को कैसे दूर रखी जाए ।

करवा चौथ को मनाने के लिए, विवाहित महिलाएं पूरे दिन बिना पानी या भोजन के गुजारती हैं.वे अपने साथी को जीवन में खुशहाली, सफलता और खुशी की कामना करने के लिए इस तरह के अनुष्ठान करती हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि विवाहित महिलाएं शाम को चांद दिखने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं।

वास्तव में यह आपका आहार है जो आपके चेहरे की चमक और अन्य महत्वपूर्ण चीजों को नियंत्रित करता है, इसलिए यहां आपको चाहिए कि आहार विशेषज्ञ की सलाहों का अनुसरण करें. 

 डाइटिशियन एक्सपर्ट के मुताबिक इस दिन को और आरामदायक बनाने के लिए  कुछ टिप्स आप अपना सकती हैं जो आपको करवाचौथ पर स्वस्थ रखने में मदद करेंगे।

इसके लिए आप चाहें तो सूर्योदय से पहले सुबह- अपने दिन की शुरुआत अनार या केला जैसे सूखे मेवों जैसे बादाम, अखरोट, खजूर या अंजीर से करें। 

उपवास के दौरान अक्सर लोगों को एसिडिटी और गैस की समस्या हो जाती है इसके लिए यह सुनिश्चित करें कि आपका भोजन कम वसा वाला हो और पेट पर बहुत भारी न हो। एक हल्की शक्कर वाली मिठाई डालें क्योंकि इससे दिन में बाद में भूख नहीं लगेगी और बाकी दिन के लिए ऊर्जा मिलेगी।

सादे पानी के बजाय नारियल पानी या नींबू का रस मिलाने से आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट्स जुड़ जाएंगे।  इस दिन स्वास्थय के लिए जरुरी है कि  आप ज्यादा चाय या कॉफी के सेवन से बचें। व्रत से पहले यानी सरगी के समय, पानी या नारियल पानी जरूर पिएं। यह शरीर में नमी बनाए रखता है, जिससे स्किन ड्राई नहीं होती।

उपवास के बाद- कुछ प्रोटीन युक्त भोजन शामिल करना एक अच्छा विचार होगा।

व्रत के तुरंत बाद ज्यादा मीठा और तला हुआ खाना खाने से बचें। अपनी शाम का आनंद लेने के लिए कुछ जश्न के भोजन के साथ एक संतुलित भोजन लेना सबसे अच्छा तरीका है।

एक संपूर्ण भोजन में आदर्श रूप से सब्जियां, दही, चपाती के रूप में साबुत अनाज, दाल के साथ कुछ चावल और कुछ मीठे शामिल होंगे। 

याद रखें , करवा चौथ का व्रत सिर्फ श्रद्धा नहीं बल्कि आत्मसंयम और प्रेम का प्रतीक है जो किसी भी पति और पत्नी के लिए बेहद खास होता है. इसके लिए यह याद रखें कि थोड़ी सी सेल्फ-केयर और प्राकृतिक नुस्खों के साथ आप न सिर्फ व्रत को सफल बना सकती हैं, बल्कि पूरे दिन अपनी चमकती मुस्कान और ग्लोइंग स्किन से दिन को यादगार भी।आशा है कि यह करवाचौथ को चेहरे पर चमक और खुशी लाने में आपकी मदद करेगा।


जानें क्या है Point Nemo और भारत की बेटियां Lieutenant Commander दिलना और रूपा


मन की बात रेडियो कार्यक्रम के 126वीं कड़ी में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने Point Nemo और Lieutenant Commander दिलना और रूपा का चर्चा किया है. आइयें जानते हैं कि क्या है प्वाइंट निमो और Lieutenant Commander दिलना और रूपा किसलिए चर्चा में हैं. 

क्या है प्वाइंट निमो

प्वाइंट निमो, जिसे दुर्गमता का महासागरीय ध्रुव भी कहा जाता है, महासागर में किसी भी भूभाग से सबसे दूर स्थित बिंदु है। यह दक्षिण प्रशांत महासागर में 48°52.6′S 123°23.6′W निर्देशांक पर स्थित है। इस प्रकार यह निकटतम भूमि से लगभग 2,688 किलोमीटर (1,670 मील) दूर है। "प्वाइंट निमो" नाम जूल्स वर्ने के "कैप्टन निमो" से आया है, जो "20,000 लीग्स अंडर द सी" का नायक है। लैटिन में, "निमो" का अर्थ "कोई नहीं" होता है।

प्वाइंट निमो की पहचान सबसे पहले 1992 में क्रोएशियाई-कनाडाई सर्वेक्षण इंजीनियर हर्वोज लुकाटेला ने विशेष कंप्यूटर सॉफ्टवेयर का उपयोग करके की थी।

Point Nemo

दुनिया की सबसे remotest  location है. वहाँ से सबसे पास कोई इंसान है तो वो International Space Station में है. वहाँ पर एक sail boat में पहुँचने वाला पहला भारतीय और पहला Asian और दुनिया के पहला इंसान होने का गौरव पाने वाले दो भारत की बेटियां हैं-

 भारत की झंडा Point Nemo पर लहराया  जहाँ से  सबसे पास कोई इंसान है तो वो International Space Station में है और वहाँ पर एक sail boat में पहुँचने वाला पहला भारतीय और पहला Asian और दुनिया के पहला इंसान बनने वाले ये दोनों बेटियां भारत से हैं.  

Lieutenant Commander दिलना और रूपा:  इंडियन नेवी में Lieutenant Commander के पद पर हैं और दोनों ने Sail Boat से ये दुनिया का circumnavigation जो किया है 

सागर परिक्रमा

  • 47500 kilometre
  • 2nd October 2024 को गोवा से यात्रा शरू और 
  •  29th May 2025 को वापस पहुंचा 
  • Expedition हमें complete करने के लिए 238 दिन लगे. 
  • भारत की झंडा Point Nemo पर लहराया

Shardiya Navratri 2025: जानें माँ दुर्गा के 9 स्वरूपों का पूजन विधि, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

 

Chaitra Navtarti 2024 Shailpurti and Nine form of Goddess Durga

Shardiya Navratri 2025: इस साल शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2025) नवरात्री में विशेष संयोग है क्योंकि  इस वर्ष शरद नवरात्र 10 दिनों का होगा। खास बात कि  9 साल बाद बन रहा एक अद्भुत संयोग है. मान्यता है कि ऐसा संजोग अच्छा और आम लोगों के के लिए शुभ माना जाता है. इसके अतिरिक्त  इस साल मां दुर्गा का वाहन हाथी है. ऐसी मान्यता है कि हाथी पर मां दुर्गा का आना सुख-समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है, जो कि मंगलकारी होता है.

नौ दिनों तक चलने वाले इस महान पर्व के दौरान भक्तगन माँ  दुर्गा के 9 रूपों का पूजन करते हैं । 

शारदीय  नवरात्र का पावन अवसर है जब  देवी दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की पूजा कि जाती है जो आम तौर पर नवरात्र शैलपुत्री या प्रतिपदा, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री सहित नौ देवी की पूजा की  जाती है।

नवरात्रि 2025 के अनुसार, माता दुर्गा के नौ रूपों का वर्णन निम्नलिखित है:

शैलपुत्री : 

पहला रूप शैलपुत्री है, जो शैल (पर्वत) की पुत्री कहलाती हैं। इस रूप में माता का ध्यान शुद्धता और त्याग में होता है। वह एक कमंडलु और लोटा धारण करती हैं। देवी शैल पुत्री देवी दुर्गा के नौ रूपों में से एक हैं जिन्हें भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती के रूप में जाना जाता है। शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना गया है जिसका उल्लेख पुराण में किया गया है। ऐसा कहा गया है कि देवी दुर्गा के सभी नौ स्वरूपों में शैपुत्री प्रथम हैं। जैसा कि हिंदू पौराणिक कथाओं में उल्लेख किया गया है, शैलपुत्री को सती का पुनर्जन्म माना जाता है और वह दक्ष शैलपुत्री की बेटी थीं।

ब्रह्मचारिणी:

 दूसरे रूप में माता ब्रह्मचारिणी हैं, जो तपस्या, ध्यान, और संतान की कल्याण की प्रतीक्षा करती हैं। ब्रह्मचारिणी देवी का नाम नवदुर्गा माता के नौ रूपों में से एक है। इस रूप में माँ दुर्गा को तपस्या, ध्यान, और संतान की कल्याण की प्रतीक्षा का दर्शाया जाता है। 

ब्रह्मचारिणी का स्वरूप उत्तम ध्यान, तपस्या, और संयम का प्रतीक है।  ब्रह्मचारिणी के हाथों में माला और कमंडलु होती है। माला का प्रतीक है ध्यान और मनन, जबकि कमंडलु तपस्या और ब्रह्मचर्य के प्रतीक होती है। वे साधारणतः सफेद वस्त्र पहनती हैं जो उनकी शुद्धता और सात्विकता को दर्शाता है।

चंद्रघंटा: 

तीसरे रूप में माता चंद्रघंटा हैं, जो चंद्र के आकार की स्थापना करती हैं। वह चंद्रमा के रूप में विशेष आसन पर बैठती हैं।  वे चाँद से प्रकाशित होती हैं और उनके मुख पर एक विशालकाय चंद्रमा की प्रतिमा होती है।

चंद्रघंटा माँ के चेहरे की दृष्टि शांतिप्रद होती है, लेकिन उनका रूप विक्रमी और महान होता है। वे अपने दो हाथों में वीणा धारण करती हैं और अपने चेहरे पर चंद्रमा के रूप का चंद्रकोटि धारण करती हैं। चंद्रघंटा माँ के चंद्रकोटि के बीच एक तिरंगा होता है, जो अभिनवता और शक्ति का प्रतीक होता है। उनके साथ अक्षमाला, बेल, और धूप-दीप का सामान होता है, जो पूजन के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। चंद्रघंटा माँ की पूजा से भक्त अपने जीवन में शांति, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उन्हें भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि माँ चंद्रघंटा हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।

कुष्माण्डा देवी:

नवदुर्गा माता के चौथे रूप में से एक हैं। इस रूप में माँ दुर्गा को जीवन की उत्पत्ति को बनाए रखने वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। कुष्माण्डा माँ का स्वरूप बहुत ही भयंकर और प्रभावशाली होता है। उनकी आंखों का रंग लाल होता है और उनके मुख पर एक उग्र मुस्कान होती है। उनके मुख के एक स्वरूप में उनके आंतरिक शक्तियों को दर्शाता है। कुष्माण्डा माँ के चार हाथ होते हैं, जिनमें एक हाथ में छड़ी और दूसरे हाथ में कमंडलु होती है। वे एक शूल और एक बिखरी चाकू धारण करती हैं, जो उनकी उत्पत्ति की प्रतीक हैं। कुष्माण्डा माँ का वाहन एक शेर होता है, जो उनकी शक्ति और साहस को प्रतिनिधित करता है। कुष्माण्डा माँ की पूजा से भक्त अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्त समस्याओं और बाधाओं का निवारण प्राप्त करते हैं, और उन्हें सार्थक और समृद्धिशाली जीवन प्राप्त होता है। उनकी पूजा भक्तों को शक्ति और साहस का आशीर्वाद प्रदान करती है।

स्कंदमाता: 

पांचवे रूप में माता स्कंदमाता हैं, जो स्कंद (कार्तिकेय) की माँ हैं। स्कंदमाता, नवदुर्गा माता के पांचवे रूप में से एक हैं। इस रूप में माँ दुर्गा को स्कंद (कार्तिकेय) की माँ के रूप में पूजा जाता है। स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत प्रसन्न और सुंदर होता है। वह एक बालक को अपने गोद में ले कर बैठती हैं, जो कार्तिकेय (स्कंद) को प्रतिनिधित करता है। उनकी विगति आध्यात्मिक और आनंदमयी होती है, और वे आकर्षक साध्वी के रूप में विशेषता दिखाती हैं।स्कंदमाता माँ की पूजा से भक्त अपने जीवन में बच्चों की संतान, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उनकी पूजा से माँ उनके परिवार की सुरक्षा के लिए आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

कात्यायनी: 

छठे रूप में माता कात्यायनी हैं, जो महिषासुर के वध के लिए उत्तर कुमार की पूजा करती हैं। कात्यायनी देवी का स्वरूप अत्यंत महान और उदार होता है। वह चेहरे पर प्रसन्नता और सौम्यता का प्रतीक होती हैं, लेकिन उनकी दृष्टि उग्र और प्रभावशाली होती है। कात्यायनी देवी के चार हाथ होते हैं, जिनमें एक हाथ में खड़ा त्रिशूल होता है और दूसरे हाथ में वीणा होती है। उनके दो हाथ और एक मुद्रा में विशेषता दिखाते हैं, जो उनके शक्ति को प्रतिनिधित करते हैं। कात्यायनी देवी का वाहन सिंह होता है, जो उनकी शक्ति और वीरता को प्रतिनिधित करता है। कात्यायनी माँ की पूजा से भक्त अपने जीवन में स्थिरता, समृद्धि, और सफलता की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उनकी पूजा से माँ उनके सभी कार्यों में सफलता के लिए संयम और निर्णय देती हैं। 

कालरात्रि: 

सातवें रूप में माता कालरात्रि हैं, जो कालरात्रि की उत्पत्ति को बनाए रखने वाली देवी हैं।कालरात्रि देवी का स्वरूप अत्यधिक उग्र और भयंकर होता है। वह काली के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं, जिनका चेहरा उग्रता और अद्भुतता से भरा होता है। उनके मुख पर विशालकाय चाकु की प्रतिमा होती है, और उनके आंखों में अग्नि की ज्वाला लगती है। कालरात्रि देवी के चार हाथ होते हैं, जिनमें एक हाथ में खड़ा त्रिशूल होता है और दूसरे हाथ में काले रंग का घड़ा होता है। उनकी तीसरी हाथ में दमरू होता है, और चौथे हाथ में वरदान का मुद्रा होता है, जो उनकी शक्ति को प्रतिनिधित करते हैं। कालरात्रि देवी का वाहन भालू होता है, जो उनकी शक्ति और संरक्षण को प्रतिनिधित करता है। कालरात्रि माँ की पूजा से भक्त अपने जीवन में शक्ति, साहस, और अभय की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उनकी पूजा से माँ उनके सभी भयों और संकटों को दूर करती हैं, और उन्हें संरक्षण और सम्मान का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। 

महागौरी देवी

 नवदुर्गा माता के आठवें रूप में से एक हैं। इस रूप में माँ दुर्गा को शुभ और पवित्र स्वरूप में पूजा जाता है। इस रूप में माँ दुर्गा को उनकी विशेषता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। महागौरी देवी का स्वरूप शानदार और दिव्य होता है। उनका चेहरा प्रकाशमय होता है और वे अत्यंत पवित्र दिखाई देती हैं। वे श्वेत वस्त्र पहनती हैं, जो उनकी निर्मलता और पवित्रता को दर्शाता है। महागौरी देवी के दो हाथ होते हैं, जिनमें एक हाथ में त्रिशूल होता है और दूसरे हाथ में वरदान का मुद्रा होता है। उनके चेहरे पर एक मुस्कान होती है, जो उनकी दयालुता और प्रसन्नता को प्रतिनिधित करती है। महागौरी देवी का वाहन सिंह होता है, जो उनकी शक्ति और साहस को प्रतिनिधित करता है। महागौरी माँ की पूजा से भक्त अपने जीवन में शुभ और पवित्र गुणों को प्राप्त करते हैं। उनकी पूजा से माँ उनके सभी दुःखों और बुराइयों को दूर करती हैं, और उन्हें शांति और सुख का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

सिद्धिदात्री:

 नौवें रूप में माता सिद्धिदात्री हैं, जो सभी सिद्धियों की देवी हैं। वह अपने दोनों हाथों में वरदान और वाहन को धारण करती हैं। ये नौ रूप माता दुर्गा के अद्वितीय और प्रतिष्ठित रूप हैं, जो नवरात्रि के नौ दिनों में पूजे जाते हैं। सिद्धिदात्री देवी, नवदुर्गा माता के नौवें और अंतिम रूप में से एक हैं। इस रूप में माँ दुर्गा को सर्वशक्तिमान सिद्धिदात्री के रूप में पूजा जाता है, जो अपने भक्तों को सिद्धियाँ (अच्छे परिणाम) प्रदान करती हैं।

सिद्धिदात्री देवी का स्वरूप अत्यधिक प्रसन्न और उदार होता है। उनका चेहरा प्रकाशमय होता है और उनकी आंखों में अनंत दया और स्नेह की भावना होती है। सिद्धिदात्री देवी के दो हाथ होते हैं, जिनमें एक हाथ में खड़ा त्रिशूल होता है और दूसरे हाथ में वरदान का मुद्रा होता है। उनके हाथों में उज्जवल और शुभता की भावना होती है। सिद्धिदात्री देवी का वाहन गदा होता है, जो उनकी सामर्थ्य और शक्ति को प्रतिनिधित करता है। सिद्धिदात्री माँ की पूजा से भक्त अपने जीवन में सिद्धियाँ, सफलता, और अनुग्रह प्राप्त करते हैं। उनकी पूजा से माँ उनके सभी कार्यों में सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

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