नज़रिया जीने का: सीखने का सबसे अच्छा तरीका अपनी गलतियों से सीखना है, पढ़ें स्टेप्स
Swami Vivekananda Jayanti 2025 Quotes : जानें स्वामी विवेकानंद के प्रमुख कोट्स जो आपके सोच को बदल देंगी
राष्ट्रीय युवा दिवस इतिहास
विवेकानंद का मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था जिन्होंने पश्चिमी दुनिया के लिए वेदांत और योग के भारतीय दर्शन की शुरुआत करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे।
विवेकानंद के महान विद्वान और दार्शनिक अपने प्रज्वलित विचारों के लिए जाने जाते हैं जिन्होंने मुख्य रूप से इस बात पर ध्यान केंद्रित किया है कि जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपने मन को कैसे नियंत्रित किया जाए। उनका दर्शन निश्चित रूप से मन को नियंत्रित करने पर बहुत जोर देता है जो कि अंतिम चीजें हैं जो हमारे व्यक्तिवाद को तय करती हैं।सत्यवादिता, निःस्वार्थता और पवित्रता जैसे गुण जीवन के महत्वपूर्ण कारक हैं जिन पर व्यक्ति द्वारा ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए जैसा कि विवेकानंद ने जोर दिया था।
विवेकानंद के अनुसार, ब्रह्मचर्य युवाओं के लिए महत्वपूर्ण कारक है और युवाओं को अपने व्यक्तित्व विकास के लिए इस पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह सहनशक्ति और मानसिक कल्याण का स्रोत है।
शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन
स्वामी विवेकानंद ने 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने इस सम्मेलन में अपने भाषण में भारत और सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया। उनके भाषण ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। इस भाषण के बाद उन्हें "युवा भारत का प्रेरणास्रोत" और "आधुनिक भारत का पिता" कहा जाने लगा।
वह अपने विचारों के लिए अद्वितीय थे जिन्होंने युवाओं को पवित्र पुस्तक भगवद् गीता का अध्ययन करने के बजाय फुटबॉल खेलने पर ध्यान केंद्रित किया क्योंकि उनका मानना है कि युवा गीता के अर्थ को अपने मजबूत कंधे और बांह के साथ बेहतर तरीके से समझ सकते हैं जो केवल फुटबॉल द्वारा ही बनाया जा सकता है।
विवेकानंद का सफलता मंत्र क्या है?
"एक विचार उठाओ। उस एक विचार को अपना जीवन बनाओ; उसका सपना देखो; उसके बारे में सोचो; उस विचार पर जियो। मस्तिष्क, शरीर, मांसपेशियों, नसों और शरीर के हर हिस्से को उस विचार से भर दो, और बाकी हर विचार को अकेला छोड़ दो। यही सफलता का रास्ता है, और इसी तरह महान आध्यात्मिक दिग्गज पैदा होते हैं।"
विवेकानंद के अनुसार सच्चा मनुष्य कौन था?
स्वामी विवेकानंद के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो जीवन में सफल होने का सपना देखता है उसके भीतर सबसे पहला गुण आत्मविश्वास का जरूर मौजूद होना चाहिए। विवेकानंद का कहना था कि जिस व्यक्ति में आत्म विश्वास नहीं होता वो बलवान होकर भी कमजोर ही बना रहता है। जबकि आत्म विश्वास से भरा हुआ व्यक्ति कमजोर होकर भी बलवान ही रहता है।
स्वामी विवेकानंद पढ़ाई कैसे करते थे?
ऐसा कहा जाता है कि विवेकानंद ध्यान साधना करते थे जिसके कारण उनकी एकाग्रता बहुत तीव्र थी। वह बहुत बुद्धिमान भी थे। इसी कारण वे एक ही दिन में 10-10 किताबें पढ़ लेते थे और उन्हें किस लाइन में क्या लिखा है और किस पृष्ठ पर क्या लिखा है यह सभी याद रहता था।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार पढ़ने के लिए क्या जरूरी है?
पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं।
विवेकानंद के महत्वपूर्ण कोटेशन
- एक विचार लो, उस एक विचार को अपना जीवन बना लो, उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो, अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, अपने शरीर के हर हिस्से को उस विचार से भर दो, और हर दूसरे विचार को अकेला छोड़ दो। यही सफलता का मार्ग है।
- अपने आप पर विश्वास करें और दुनिया आपके चरणों में होगी।
- किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या न आए तो आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत रास्ते पर यात्रा कर रहे हैं।
- एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा को उसमें डाल दो, बाकी सब कुछ छोड़कर।
- उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।
- दिन में एक बार अपने आप से बात करें, नहीं तो आप इस दुनिया के एक बेहतरीन इंसान से मिलने से चूक सकते हैं।
- एक आदमी एक रुपये के बिना गरीब नहीं है, लेकिन एक आदमी सपने और महत्वाकांक्षा के बिना वास्तव में गरीब है।
- मस्तिष्क और मांसपेशियों को एक साथ विकसित होना चाहिए। लोहे की नसें एक बुद्धिमान मस्तिष्क के साथ - और पूरी दुनिया आपके चरणों में है।
- हमेशा खुद को खुश दिखाने की कोशिश करें। शुरू में यह आपका रूप बन जाता है, धीरे-धीरे यह आपकी आदत बन जाता है और अंत में यह आपका व्यक्तित्व बन जाता है.
- "ब्रह्मांड की सभी शक्तियां हमारे अंदर हैं। बस हमें उनका उपयोग करना सीखना है।"
- "स्वयं को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।"
- "ज्ञान और कर्म दोनों के बिना जीवन अधूरा है।"
- "सपने देखना और उन सपनों को पूरा करने के लिए प्रयास करना ही जीवन का उद्देश्य है।"
नजरिया जीने का: इन टिप्स से बचाएं खुद को नेगेटिव थॉट्स के ट्रैप में फंसने से
जब ये विचार बार-बार आने लगें और लंबे समय तक टिके रहें, तो यह एक मानसिक ट्रैप की तरह हमें अपने गिरफ्त में ले लेता है जो न केवल हमारे आत्मविश्वास को कमजोर करता है, बल्कि हमारे व्यवहार, निर्णय और स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।
नजरिया जीने का: जानें वृक्ष के चिरस्थायी लाभों को समर्पित प्रधानमंत्री का सुन्दर श्लोक
खुद से सवाल करें
नकारात्मक विचारों का दौर हर किसी के जीवन में आता है, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि विचारों को नियंत्रित किया जा सकता है। कभी आपने सोचा है कि अचानक आखिर नकारात्मक विचार क्यों जगह बना लेते हैं. कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो सीधे तौर पर नकारात्मक विचार हमारे अंदर हावी करते हैं जैसे कोई असफलता या निराशा का डर खासतौर पर जब चीजें हमारे मन मुताबिक नहीं होतीं या हमें किसी आशा के विपरीत निराशा मिलती है.
जीवन शार्ट नहीं लॉन्ग रेस है
दूसरों से हमें अपनी तुलना की आदत भी काफी बुरा प्रभाव डालती है और हमें आज के प्रतिस्पर्धा वाले दौर में हम किसी से मामूली रूप से भी पिछड़ना नहीं चाहते हैं. हम ये भूल जाते हैं कि जीवन शार्ट रेस नहीं बल्कि लॉन्ग रेस है और मामूली बढ़त या पीछा होना कोई मतलब है है क्योंकि इसे स्ट्रेटेजी कहते हैं और अंतिम राउंड में जीत को फाइनल कहा जाता है.
उम्मीद की एक लौ को जलाना सीखें
हर नकारात्मक विचार को चुनौती दें, क्योंकि वही आपके आत्मबल की परीक्षा है।”सकारात्मक सोच रखने वाले दोस्तों, परिवार या मार्गदर्शकों से जुड़े रहें। इसके साथ ही जब मन उदास हो, तब अपने भीतर झांकिए — वहां उम्मीद की एक लौ हमेशा जलती रहती हैऔर उस लौ को हमेशा जलाये रखिये.
अतीत की जाल से बाहर निकलें
अक्सर हम अपने अतीत या पुरानी गलतियों को बार-बार याद करके अपने वर्तमान को खराब करते हैं. यह तय है कि जो ख़तम हो चूका है या बीत गया है वह लौट नहीं सकता और उससे सिर्फ सबक लेकर हमें आगे की कर देखना हीं हमारे भविष्य का निर्माण करेगा. इसके अतिरिक्त पुराने अतीत के बारे में लगातार सोचने से तनाव, चिंता और अवसाद बढ़ता है जो न केवल हमारे वर्तमान बल्कि भविष्य को भी ख़राब करती है.
खुद को कम आंकने की गलती
अक्सर हम खुद को काम आंकना दूसरों से अपने को कम आंकने की बीमारी पाल लेते हैं जिसमे हमें यह लगने लगता है की समय हमारे साथ नहीं है या मुझमे वह योग्यता नहीं है जो किसी भी प्रकार से योग्य है और यह हमारी सफलता में सबसे बड़ी बाधा है. इसके अतिरिक्त यह आपके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं और यह दीर्घकालिक भी रह सकता है.
जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक का सफर: Facts in Brief
पार्टी ने अपने बेदाग़ नेताओं की छवि और कुशल नेतृत्व के बदौलत आज प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बुलंदी को छू चुकी है, संसद में कभी मात्र 2 सांसदों के पार्टी रही भाजपा आज देश में न केवल गठबंधन सरकारों की युग को ख़त्म कर दिया बल्कि अपनी बदौलत सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या भी जुटाने में कामयाब रही.
- स्थापना वर्ष: 1951
- संस्थापक: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
- BJP का वैचारिक स्रोत किस संगठन से जुड़ा है-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)
- 1951 डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में अखिल भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुआ.
- 1952 में संपन्न आम चुनाव में भारतीय जनसंघ ने तीन सीटें जीतीं।
- 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर की जेल में मौत हो गई.
- 1957 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 4 सीटें जीती.
- 1962 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 14 सीटें जीतीं।
- 1967 लोक सभा चुनाव में जनसंघ को 35 सीटें मिलीं।
- 1971 के लोकसभा चुनाव भारतीय जनसंघ ने 22 सीटे जीती..
- 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन
- 1984 के लोक सभा चुनाव् में जो इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुई थी कांग्रेस की प्रचंड लहर थी और भारतीय जनता पार्टी ने 2 सीटें जीती.
- 1986-लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के अध्यक्ष बने
- 1989 के लोक सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 85 सीटें जीती.
- 1991 के लोक सभा चुनाव में पार्टी ने 120 सीटें जीती. मुरली मनोहर जोशी पार्टी के अध्यक्ष बने.
- 1996 लोक सभा चुनाव में भाजपा को 161 सीटें मिलीं
- 1999 में भाजपा ने 183 सीटें जीती.
- 2004 में भाजपा ने 138 सीटें जीती.
- 2009 में भाजपा को 116 सीटें मिली.
- 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्वे में भाजपा ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त करते हुए 282 सीटें जीती.
- 2014 के राजग जो भाजपा का व्यापक गठबंधन है उसने कुल 336 सीटों पर जीत प्राप्त किया.
- उल्लेखनीय है कि 1984 के बाद ऐसा पहली बार हुआ जब भारतीय संसद में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिला था.
- 2019 में भाजपा ने 303 सीटें जीती.
- भारतीय जनता पार्टी के मुखपत्र का नाम 'कमल सन्देश' है.
नजरिया जीने का: प्रधानमंत्री के क्रोध को त्यागने वाला कौन सा श्लोक आज हर जुबान पर है
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः।
क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्व क्रोधोऽपकर्षति॥
इसका अर्थ है कि क्रोध प्राण लेने वाला शत्रु है, जो मित्र के रूप में दिखता है पर भीतर से दुश्मन होता है। क्रोध अत्यंत तीक्ष्ण (धारदार) तलवार के समान है, जो जीवन की हर अच्छाई को काट देता है।
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः।
— Narendra Modi (@narendramodi) December 12, 2025
क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्व क्रोधोऽपकर्षति॥ pic.twitter.com/GBxlYC0oIH
नजरिया जीने का: जानें वृक्ष के चिरस्थायी लाभों को समर्पित प्रधानमंत्री का सुन्दर श्लोक
वास्तव में उक्त श्लोक वाल्मीकि रामायण से लिए गया है जिसका चर्चा प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सद्भाव के लिए क्रोध को त्यागने की आवश्यकता बताते हुए किया है.
क्रोधः प्राणहरः शत्रु: क्रोधो मित्रमुखी रिपुः |
क्रोधो हि असिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोपकर्षति ||
-वाल्मीकि रामायण
गुस्सा अर्थात क्रोध एक दुश्मन की तरह है जो किसी की जान ले सकता है और दोस्तों के बीच दुश्मनी का मुख्य कारण भी है। गुस्सा निश्चित रूप सेएक बहुत तेज़ तलवार की तरह है, जो हर किसी को नुकसान और अपमान पहुंचा सकता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो गुस्सा प्राणहरण करने वाले शत्रु के समान है तथा मित्रों के बीच शत्रुता होने का कारण भी होता है | क्रोध वास्तव में एक तीक्ष्ण तलवार के समान है जो सब् को अपमानित कर हानि पहुंचाता है. श्लोक का साफ अर्थ है कि हमें गुस्सा अर्थात क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण करना चाहिए.
संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी: जानें ओल चिकी लिपि के बारे में जिसकी हम इस वर्ष शताब्दी मना रहे हैं
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह सभी संथाली लोगों के लिए गर्व और खुशी की बात है कि भारत का संविधान अब संथाली भाषा में, ओल चिकी लिपि में उपलब्ध है। इससे वे संविधान को अपनी भाषा में पढ़ और समझ सकेंगे।संथाली भाषा भारत में जनजातीय भाषा बोलने वाला सबसे बड़ा जनजातीय समूह है।
इस वर्ष हम ओल चिकी लिपि की शताब्दी मना रहे हैं।
ओल चिकी लिपि: जानें खास बातें
- पंडित रघुनाथ मुर्मू ने सनतली भाषा के लिए एक लिपि विकसित की, जिसे ' ओल चिकी लिपि ' के नाम से जाना जाता है। ऐसा मान्यता है कि इस लिपि को 1935-36 में विकसित किया गया था।
- ओल चिकी लिपि वर्णमाला में छह स्वर और चौबीस व्यंजन हैं, जिनमें प्रत्येक स्वर के बाद चार व्यंजन आते हैं.
- लेकिन एक व्यंजन केवल एक स्वर के बाद ही आता है।
संथाली भाषा: Facts in Brief
- संथाली भाषा, जिसे 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था.
- भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक है।
- यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों द्वारा बोली जाती है।
रेलवे का बड़ा फैसला: ट्रेनों के किराया में हुआ परिवर्तन, देखें कहाँ और कितनी हुई बढ़ोतरी
नए साल के अवसर पर रेलवे ने यात्रियों के लिए ट्रेनों के किराए में बदलाव किया है.संशोधित किराया केवल 26 दिसंबर 2025 से बुक किए गए टिकटों पर लागू होगा, हालाँकि पहले से बुक टिकटों पर भविष्य की यात्रा के लिए भी कोई प्रभाव नहीं लागु होगा. हालाँकि छोटे दुरी की यात्रा करने वालों के लिए लिए कोई नहीं लेकिन लंबी दूरी के यात्रियों का किराया थोड़ा महंगा हो गया है.
हालाँकि परिवर्तित किराया किराया संरचना के अनुसार उपनगरीय सेवाओं और सीजन टिकटों के किराए में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
रेलवे के अनुसार आरक्षण शुल्क, सुपरफास्ट अधिभार या अन्य सहायक शुल्कों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, ये सभी मौजूदा नियमों के अनुसार ही लागू रहेंगे।
साधारण नॉन-एसी (गैर-उपनगरीय) सेवाओं के लिए द्वितीय श्रेणी साधारण, स्लीपर श्रेणी साधारण और प्रथम श्रेणी साधारण में किराए को श्रेणीबद्ध तरीके से युक्तिसंगत बनाया गया है।
साधारण द्वितीय श्रेणी में 215 किमी तक की यात्राओं के लिए किराए में कोई वृद्धि नहीं है, जिससे कम दूरी और दैनिक यात्रियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
216 किमी से 750 किमी तक की दूरी के लिए किराया 5 रुपये बढ़ाया गया है।
इससे अधिक दूरी की यात्राओं के लिए वृद्धि चरणबद्ध तरीके से लागू की गई है- 751 किमी से 1250 किमी के बीच की दूरी के लिए 10 रुपये, 1251 किमी से 1750 किमी के बीच की दूरी के लिए 15 रुपये और 1751 किमी से 2250 किमी के बीच की दूरी के लिए 20 रुपये।
स्लीपर श्रेणी साधारण और प्रथम श्रेणी साधारण में गैर-उपनगरीय यात्राओं के लिए किराए में प्रति किलोमीटर 1 पैसे की दर से एकसमान संशोधन किया गया है, जिससे किराए में क्रमिक और सीमित वृद्धि सुनिश्चित हुई है।
मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों में नॉन-एसी और एसी दोनों श्रेणियों में किराए में 2 पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी की गई है।
इसमें स्लीपर क्लास, फर्स्ट क्लास, एसी चेयर कार, एसी थ्री-टियर, एसी टू-टियर और एसी फर्स्ट क्लास शामिल हैं।
नॉन-एसी मेल/एक्सप्रेस कोच में 500 किलोमीटर की यात्रा के लिए यात्रियों को लगभग 10 रुपये अतिरिक्त देने होंगे।
आर्डिनरी (गैर-AC) ट्रेनों में बदलाव किया गया है
- द्वितीय श्रेणी आर्डिनरी
- -215 किमी तक: कोई बढ़ोतरी नहीं
- -216–750 किमी: ₹5 बढ़ोतरी
- -751–1250 किमी: ₹10 बढ़ोतरी
- -1251–1750 किमी: ₹15 बढ़ोतरी
- -1751–2250 किमी: ₹20 बढ़ोतरी
मेल/एक्सप्रेस (नॉन-एसी)
- सेकंड क्लास (मेल/एक्सप्रेस) 02 पैसे
- स्लीपर क्लास (मेल/एक्सप्रेस) 02 पैसे
- फर्स्ट क्लास (मेल/एक्सप्रेस) 02 पैसे
AC क्लास
- AC चेयर कार 02 पैसे
- AC-3 टियर/3E 02 पैसे
- AC-2 टियर 02 पैसे
- AC फर्स्ट क्लास/EC/EA 02 पैसे
इन गाड़ियों के भाड़े में होगी परिवर्तन?
तेजस राजधानी, राजधानी, शताब्दी, दुरंतो, वंदे भारत, हमसफर, अमृत भारत, तेजस, महामाना, गतिमान, अंत्योदय, गरीब रथ, जन शताब्दी, युवा एक्सप्रेस, नमो भारत रैपिड रेल और साधारण गैर-उपनगरीय सेवाओं (जहां लागू हो, एसी एमईएमयू/डीईएमयू को छोड़कर) सहित प्रमुख रेल सेवाओं के मौजूदा मूल किरायों को अनुमोदित श्रेणीवार मूल किराया वृद्धि के अनुरूप संशोधित किया गया है। यह संशोधन सभी श्रेणियों में समान रूप से और एक क्रमबद्ध तरीके से किया गया है।
स्लीपर क्लास
-1 पैसा प्रति किमी की बढ़ोतरी
फर्स्ट क्लास (आर्डिनरी)
-1 पैसा प्रति किमी की बढ़ोतरी
जीएसटी की प्रयोज्यता अपरिवर्तित रहेगी और किराए को प्रचलित मानदंडों के अनुसार किराय का पूर्णांकन जारी रहेगा।
यात्रियों को इन टिकटों पर नहीं लगेंगे चार्ज
पहले से जारी किए गए टिकटों के मामले में, संशोधित किराया ऐसे टिकटों पर लागू नहीं होगा। इसलिए, 26.12.2025 को या उसके बाद की यात्रा के लिए ऐसे टिकटों पर किराए का अंतर आरक्षण चार्ट में नहीं दिखाया जाएगा। हालांकि, 26.12.2025 को या उसके बाद ट्रेनों/स्टेशनों पर TTE/टिकट चेकिंग स्टाफ द्वारा बनाए गए किसी भी नए टिकट पर संशोधित दर से शुल्क लिया जाएगा।
संशोधित किराया केवल 26 दिसंबर 2025 को या उसके बाद बुक किए गए टिकटों पर लागू होगा। इस तिथि से पहले बुक किए गए टिकटों पर, चाहे यात्रा प्रभावी तिथि के बाद ही क्यों न हो, कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा।
नजरिया जीने का: हर झगड़े में जीतने से ज्यादा जरूरी है रिश्ते को बचाना
हम यह भूल से गए हैं की कुछ रिश्ते माफी मांगने से नहीं, समझने से सुलझते हैं और हमारे अहंकार और ईगो का कद इतना बड़ा हो चूका है कि हमें माफ़ी मांगने में संकोच होने लगा है.
झगड़े इंसान को तोड़ते हैं, समझौता रिश्तों को जोड़ता है
जुबान के तीखे शब्द सबसे बड़े झगड़े की जड़ बन सकते हैं और इसलिए यह जरुरी है कि आप रिश्तों की जीवंतता के लिए जुबान लगाम रखें. याद रखें, झगड़े इंसान को तोड़ते हैं, समझौता रिश्तों को जोड़ता है और इसलिए समझौतों की अहमियत को समझें. लेकिन यह भी सच है कि भावनात्मक रूप से परेशान करने वाला या कठोर नहीं होना चाहिए क्योंकि यह कहा गया है कि "अगर हम हर लड़ाई जीतना चाहें, तो शायद रिश्ते हार जाएंगे।"और आप विश्वास करें कि यही जीवन का एकमात्र सच्चाई है।
लड़ाई जितने के लिए रिश्तों को नहीं हराएँ
आज के इस दौर मे जहां हमें अपने हेक्टिक जीवनशैली और भागती जिंदगी मे रिश्तों को बचाने कि जदोजहद से दो चार होना हमारी लाचारी बन चुकी है, ऐसे मे अगर हम झगड़ों कि कीमत पर सह-अस्तित्व की भावना को तिलांजलि देंगे तो बहाल जीवन का क्या हश्र होगा? जब रिश्तों की बात आती है तो मनमुटाव का होना अपरिहार्य है और इसे अवॉइड करना कुछ हद तक मुश्किल होता है।
अहंकार का कद छोटा होना आवश्यक
क्या यह सच नहीं है कि जहां अहंकार खत्म होता है, वहां झगड़ा भी खत्म हो जाता है और इसके लिए यह जरूरी है कि हम झगड़ों को छोड़कर सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा दें ताकि हमारा जीवन सँवर सके। जीवन में सह-अस्तित्व का मतलब हीं यही है कि मिल-जुलकर रहना और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना और संघर्षों से ऊपर उठना। हर झगड़े में जीतने से ज्यादा जरूरी है रिश्ते को बचाना और इसके लिए जरुरी है कि जब आप झगड़ों से बचकर एक-दूसरे को समझने और अपनाने का प्रयास करते हैं, तो जीवन में सुख, शांति और संतोष बढ़ता है।
समझौता रिश्तों को जोड़ता है
अगर आप जीवन मे झगड़े और समझौते के महत्व को समझेंगे तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक तरफ जहां झगड़े इंसान को तोड़ते हैं, समझौता रिश्तों को जोड़ता है। समझौते कि कीमत को समझें और झगड़े कि नकारात्मक प्रभाव को कभी भी जीवन मे तवज्जो नहीं दें।
अक्सर हम जीवन मे खुद के कद से अधिक अपने अहंकार को बना लेते हैं जो एक प्रमुख वजह होता है आपस के रिश्तों को खत्म कर अहंकार के बीजारोपन का। याद रखें, जहां अहंकार खत्म होता है, वहां झगड़ा भी खत्म हो जाता है।
पंबन ब्रिज: जानें भारत के पहले वर्टिकल लिफ्ट सी ब्रिज के बारे में, खूबियां और निर्माण की चुनौतियों के बारे में
नया पंबन ब्रिज भारत की परंपरा और नवाचार को एक साथ लाने की क्षमता का प्रतीक है। पर्यावरण, रसद और तकनीकी चुनौतियों को पार करते हुए, यह अत्याधुनिक वर्टिकल लिफ्ट रेलवे ब्रिज देश की बढ़ती बुनियादी ढांचा क्षमताओं का एक गौरवान्वित करने वाला प्रमाण है। जब ट्रेनें और जहाज बिना किसी परेशानी के ऊपर से गुजरने के लिए तैयार होते हैं, तो यह पुल हमें याद दिलाता है कि जब लक्ष्य और दृढ़ संकल्प एक साथ मिल जाते हैं, तो क्या हासिल किया जा सकता है।
एक सदी से भी ज्यादा समय तक यह तीर्थयात्रियों, पर्यटकों और व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा के रूप में काम करता रहा है। हालांकि, मुश्किल समुद्री वातावरण और बढ़ती परिवहन मांगों के कारण आधुनिक समाधान की ज़रूरत थी। 2019 में, भारत सरकार ने तकनीकी रूप से उन्नत, भविष्य के लिए तैयार पुल के निर्माण को मंजूरी दी।
इसके परिणामस्वरूप एक चमत्कार के रूप में, तमिलनाडु में पाक जलडमरूमध्य पर फैला 2.07 किलोमीटर लंबा भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट रेलवे सी ब्रिज सामने आया है। विरासत को नवाचार के साथ मिलाते हुए, नया पंबन ब्रिज न केवल क्षेत्र के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को संरक्षित करता है, बल्कि डिजाइन, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय विकास में एक महत्वपूर्ण छलांग भी दर्शाता है।
नया पंबन ब्रिज रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) द्वारा बनाया गया था, जो रेल मंत्रालय के तहत एक नवरत्न पीएसयू है।
निर्माण में चुनौतियां: बाधाओं पर काबू पाना
नए पंबन ब्रिज के निर्माण में पर्यावरणीय बाधाओं से लेकर रसद संबंधी जटिलताओं तक कई चुनौतियां सामने आईं। पाक जलडमरूमध्य के अशांत जल, तेज हवाएं और अप्रत्याशित मौसम पैटर्न ने निर्माण प्रक्रिया में कठिनाइयां पैदा कीं। इसके अतिरिक्त, चक्रवातों और भूकंपीय गतिविधि के प्रति क्षेत्र की संवेदनशीलता ने सावधानीपूर्वक योजना बनाने और मजबूत डिजाइन की आवश्यकता जताई।
नए पंबन ब्रिज की मुख्य विशेषताएं क्या है?
- 72.5 मीटर लंबे पुल को 17 मीटर तक ऊपर उठाया जा सकता है, जिससे बड़े जहाज़ इसके नीचे से गुजर सकते हैं।
- नया पुल मौजूदा पुल से 3 मीटर ऊंचा है, जिससे समुद्री संपर्क में सुधार हुआ है।
- इस सबस्ट्रक्चर को दो ट्रैक के लिए डिजाइन किया गया है, जिसमें सुपरस्ट्रक्चर में शुरू में एक ही लाइन होगी।
- आधुनिक सामग्रियों और इंजीनियरिंग तकनीकों के इस्तेमाल से पुल की लंबी उम्र सुनिश्चित होगी।
- पुल का निर्माण स्टेनलेस स्टील की ताकत, उच्च श्रेणी के सुरक्षात्मक पेंट और पूरी तरह से वेल्डेड जोड़ों के साथ किया गया है।
- विशेष पॉलीसिलोक्सेन कोटिंग इसे जंग से बचाती है, जिससे मुश्किल समुद्री वातावरण में भी इसकी लंबी उम्र सुनिश्चित होती है।
नया पंबन ब्रिज सुनिश्चित करेगा:
बेहतर परिवहन: भारी रेल यातायात और तेज ट्रेनों को समायोजित करना।
समुद्री एकीकरण: बड़े जहाजों को बिना किसी व्यवधान के गुजरने की अनुमति देना।
स्थायित्व: न्यूनतम रखरखाव के साथ 100 से अधिक वर्षों का जीवनकाल सुनिश्चित करना।
भारत वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है
जहां नया पंबन ब्रिज भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट सी ब्रिज है, वहीं, यह अपनी तकनीकी प्रगति और अद्वितीय डिजाइन के लिए जाने जाने वाले अन्य विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त पुलों के जैसा नजर आता है। इनमें संयुक्त राज्य अमेरिका में गोल्डन गेट ब्रिज, लंदन में टॉवर ब्रिज और डेनमार्क-स्वीडन में ओरेसंड ब्रिज शामिल हैं। इनमें से प्रत्येक प्रतिष्ठित संरचना, भले ही डिजाइन और कार्यक्षमता में भिन्न है, लेकिन इंजीनियरिंग उत्कृष्टता के शिखर का प्रतिनिधित्व करती है। अब, नया पंबन ब्रिज भारत की तटीय और भूकंपीय स्थितियों द्वारा उत्पन्न चुनौतियों के साथ अत्याधुनिक तकनीक को जोड़ते हुए, गर्व से खड़ा है।
पूर्णिमा को जन्म लेने वाले होते हैं सूर्य के समान सितारा: गौतम बुद्ध , महर्षि वेदव्यास, नानक देव और अन्य
पूर्णिमा के दिन जन्मे बच्चे कैसे होते हैं
उदार प्रवृति:
पूर्णिमा के दिन जन्म लेने वाले जातक की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि ऐसे लोग अपने जीवन में काफी उदार प्रवृत्ति वाले होते हैं ऐसे लोग दूसरों के मनोभावों को और भावनाओं को काफी अच्छी तरह समझते हैं. यह लोग अपने संबंधी या आपने आसपास के लोगों को हमेशा सुखी देखना चाहते हैं और उनके सुख दुख में हमेशा साथ रहते हैं वह कभी भी अपने संबंधियों के वह हमेशा वह हमेशा अपने संबंधियों और अपने दोस्तों की आवश्यकता के समय उपलब्ध रहते हैं.
जानें किस दिन को जन्म लेने वाले लोग होते हैं रोमांटिक और अपने पार्टनर के प्रति केयरिंग
भगवान में विशेष अनुरक्ति
पूर्णिमा के दिन जन्म लेने वाले जातक भगवान में अत्यधिक विश्वास करने वाले होते हैं और उनका ऐसा मान्यता है कि ईश्वर हमेशा उनके लिए उपलब्ध रहते हैं. ईश्वर की भक्ति और पूजा-पाठ उनके जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा होती है और उनका यह मान्यता है की ईश्वर होता है जो किसी भी संकट या कष्ट में वह मदद करता है. ऐसे विश्वास का कारण भी होता क्योंकि ये लोग अपने कार्यो को अंजाम तक पहुंचाने के दौरान भी ईश्वर को नहीं भूल सकते हैं.
गुरु/पिता का विशेष स्थान:
पूर्णिमा के दिन जन्म लेने वाले जातकों में अपने गुरु और पिता के प्रति विशेष अनुरक्ति देखी जाती है. जीवन में किसी भी उपलब्धि या विशेष अवसरों पर ऐसे लोग अपने पिता और अपने गुरु को विशेष तौर पर याद करना हैं और सारा श्रेय उन्हें हीं देना पसंद करते हैं. उनका ऐसा मान्यता है कि जीवन में पिता और टीचर के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता और जीवन में वाे इनके प्रति वे काफी अनुराग दिखाते हैं और अपना पथ प्रदर्शक और मोटीवेटर मानते हैं.
वचन के पक्के:
पूर्णिमा के दिन जन्म लेने वाले जातकों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह वचन के काफी पक्के होते हैं. उनके लिए उनके द्वारा किया गया कोई भी वादा या वचन अपने जीवन से काफी जरूरी है और इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं. उनके लिए अपने द्वारा दिया गया कोई भी वचन या किया गया वादा को हर हाल में पूरा किया जाना और ऐसे लोग ईमानदारी के साथ उसे पूरा करने की कोशिश भी करते हैं.
यशस्वी और प्रभावशाली:
पूर्णिमा के दिन जन्म लेने वाले जातक काफी यशस्वी और प्रभावशाली होते हैं जो जीवन में काफी प्रभाव छोड़ने में सफल रहते हैं. ऐसे लोग अपने कर्मों और अपने सोच की वजह से जीवन में काफी आगे बढ़ते हैं साथ ही दुनिया को रोशनी भी दिखाने का काम करते हैं. उन्हें जो भी काम जीवन में मिलती है वे लोग उसे काफी तल्लीनता के साथ करना पसंद करते हैं.
ईमानदारी:
ईमानदारी पूर्णिमा के दिन जन्म लेने वाले लोगों का सबसे प्रमुख विशेषता होती है जीवन जीने के लिए ऐसे लोग ईमानदारी को काफी तवज्जो देते हैं और जीवन में आगे बढ़ने का सबसे प्रमुख कारण यही होती है कि वे अपने जीवन के हर क्षेत्र में चाहे वह इनके निजी जीवन हो या परिवारिक जीवन हो सामाजिक जीवन हो या प्रोफेशनल फ्रंट, हर जगह वह इमानदारी से अपने काम को अंजाम देते हैं.
पूर्णिमा के दिन जन्म लेने वालों में अक्सर समाज और दुनिया के महापुरुषों और धार्मिक हस्तियों का नाम आता है. पूर्णिमा के दिन जिन महापुरुषों और धार्मिक हस्तियों का जन्म हुआ था उनमे शामिल हैं-
गौतम बुद्ध: बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बुद्धत्व), और महापरिनिर्वाण (मृत्यु) तीनों ही वैशाख पूर्णिमा के दिन हुए थे। इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
महर्षि वेदव्यास: जिन्होंने वेदों का संकलन किया और महाभारत की रचना की, उनका जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ था। इस दिन को भारत में गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
गुरु नानक देव जी: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म पारंपरिक रूप से कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जिसे गुरु नानक जयंती के नाम से जाना जाता है।
संत कबीर दास: कई ऐतिहासिक स्रोतों और मान्यताओं के अनुसार, संत कबीर का जन्म ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था।
चैतन्य महाप्रभु: गौड़ीय वैष्णव धर्म के एक प्रमुख संत और समाज सुधारक चैतन्य महाप्रभु का जन्मदिन फाल्गुन पूर्णिमा को 'गौरा पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है।
GK Quiz: पृथ्वी से चंद्रमा के हमेशा एक ही भाग के दिखाई देने का कारण क्या है?
प्रश्न 1: पृथ्वी–चंद्रमा प्रणाली का द्रव्यमान केंद्र (Barycenter) कहाँ स्थित होता है?
उत्तर: पृथ्वी के अंदर, उसकी सतह से लगभग 1700 किमी नीचे।
प्रश्न 2 : पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों में चंद्रमा का गुरुत्वीय प्रभाव अपेक्षाकृत कम क्यों होता है?
उत्तर: चंद्रमा का गुरुत्वीय प्रभाव भूमध्यरेखीय उभार (Equatorial Bulge) पर अधिक केंद्रित होता है।
प्रश्न 3 : चंद्रमा की कक्षा का पृथ्वी की कक्षा (Ecliptic) से झुकाव कितना है?
उत्तर: लगभग 5° (5.145°)।
प्रश्न 4 : पृथ्वी को ‘नीला ग्रह’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि पृथ्वी का लगभग 71% भाग जल से ढका है।
प्रश्न 5 : पृथ्वी से चंद्रमा के हमेशा एक ही भाग के दिखाई देने का कारण क्या है?
उत्तर: चंद्रमा का घूर्णन काल और परिक्रमण काल समान होना (Synchronous Rotation)।
प्रश्न 6 : चंद्रमा पर पाए जाने वाले गहरे मैदानों (Maria) का निर्माण किससे हुआ है?
उत्तर: प्राचीन ज्वालामुखीय लावा प्रवाह से।
प्रश्न 7 : चंद्रमा पर जाने वाला पहला मानव मिशन कौन-सा था?
उत्तर: अपोलो-11 (1969)।
प्रश्न 8 : पृथ्वी का कौन-सा स्तर चंद्रमा के निर्माण सिद्धांत से जुड़ा माना जाता है?
उत्तर: मेंटल (Giant Impact Theory के अनुसार)।
प्रश्न 9 : चंद्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में कितना होता है?
उत्तर: लगभग 1/6 भाग।
प्रश्न 10 : पृथ्वी पर दिन-रात की अवधि में दीर्घकालिक परिवर्तन का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: चंद्रमा के ज्वारीय प्रभाव से पृथ्वी की घूर्णन गति का धीमा होना।
रविवार को जन्मे लोग: होते हैं सूर्य के समान तेजस्वी, आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और रचनात्मकता से परिपूर्ण
- अद्विक (अद्वितीय),
- आरुष (सूरज की पहली किरण),
- विहान: 'भोर' या 'नई शुरुआत'
- रेयांश (प्रकाश की किरण),
- ईशान (भगवान शिव),
- अयान (ईश्वर का उपहार),
- शौर्य (बहादुरी),
- ध्रुव (स्थिर),
- ईशान: 'भगवान शिव' का एक नाम।
- निहार: 'सुंदर धुंध' या 'कोहरा'।
- समर्थ: 'सक्षम और कुशल'।
- आरोहण: 'उदय'।
- ऋषि: 'साधु', 'पवित्र'।
होते हैं महफिलों की जान
चार धाम यात्रा: क्या हैं इसके पीछे के रहस्य और क्यों है यह जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा?
भारत के चार धाम और सम्बंधित राज्य निम्न हैं.
- बद्रीनाथ (उत्तराखंड)
- द्वारका (गुजरात)
- जगन्नाथ पुरी (उड़ीसा)
- रामेश्वरम (तमिलनाडू )
यह धाम उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है यहां बद्रीनाथ मंदिर है, जिसमें विष्णु के बद्रीनाथ रूप की मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह मंदिर चार धामों में से एक है और चार धाम यात्रा का पूर्वी धाम है। बद्रीनाथ भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है. यह अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है और चार धाम यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है.
बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की एक चरणपादुका (पैर की छाप) स्थापित है. बद्रीनाथ मंदिर को 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने बनवाया था. मंदिर परिसर में कई अन्य मंदिर और धार्मिक स्थल भी हैं, जिनमें से कुछ हैं:
तप्त कुंड: यह एक गर्म पानी का कुंड है, जिसका पानी पवित्र माना जाता है.
नारद कुंड: यह एक पवित्र कुंड है, जिसका पानी भगवान नारद को समर्पित है.
ब्रह्म कुंड: यह एक पवित्र कुंड है, जिसका पानी भगवान ब्रह्मा को समर्पित है.
गरुड़ चट्टान: यह एक चट्टान है, जिस पर भगवान गरुड़ का पदचिह्न है.
वेद व्यास गुफा: यह एक गुफा है, जहां वेद व्यास ने महाभारत की रचना की थी.
बद्रीनाथ एक अत्यंत लोकप्रिय तीर्थस्थल है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं. मंदिर परिसर को चारों ओर से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों से घेरा हुआ है, जो इसकी सुंदरता को और बढ़ा देता है. बद्रीनाथ एक शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक स्थान है, जहां लोग आकर आराम और शांति पा सकते हैं.
जगन्नाथ पुरी (Jagannath Puri):
जगन्नाथ पुरी भारत के ओडिशा राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है. यह भगवान जगन्नाथ को समर्पित एक विशाल मंदिर के लिए जाना जाता है. मंदिर को 12वीं शताब्दी में ओडिशा के राजा अनंतवर्मन ने बनवाया था. मंदिर का निर्माण लाल और सफेद बलुआ पत्थर से किया गया है और यह 135 फीट ऊंचा है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां स्थापित हैं. भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है.
जगन्नाथ पुरी एक अत्यंत लोकप्रिय तीर्थस्थल है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं. मंदिर परिसर को चारों ओर से दीवारों से घेरा हुआ है और केवल हिंदू ही मंदिर के अंदर प्रवेश कर सकते हैं. मंदिर के परिसर में एक विशाल रथ यात्रा होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को मंदिर से बाहर निकालकर शहर के चारों ओर घुमाया जाता है. रथ यात्रा एक अत्यंत भव्य और रंगीन उत्सव है, जो लाखों लोगों को आकर्षित करती है. यह धाम ओडिशा राज्य के पुरी जिले में स्थित है। जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बालभद्र, और सुभद्रा की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। यह मंदिर चार धामों में से पश्चिमी धाम है।
रामेश्वरम् (Rameswaram):
यह धाम तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम जिले में स्थित है। रामेश्वरम में श्री रामेश्वर स्वामी मंदिर है, जिसमें शिव के पृथ्वी तत्व को दर्शाने वाली ज्योतिर्लिंग की पूजा की जाती है। यह मंदिर चार धामों में से दक्षिणी धाम है।
रामेश्वरम भारत के तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले में स्थित एक द्वीप शहर है. यह शहर हिंदुओं के चार धामों में से एक है और भगवान शिव को समर्पित रामेश्वरम मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. रामेश्वरम मंदिर एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद किया था. मंदिर में भगवान शिव का एक लिंग स्थापित है, जिसे रामलिंगम कहा जाता है. रामेश्वरम मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं.
रामेश्वरम एक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है. यह शहर रामायण के कई घटनाओं से जुड़ा हुआ है. रामेश्वरम में रामेश्वरम द्वीप, रामेश्वरम मंदिर, धनुषकोटि, सीतामीनार और रामेश्वरम रेलवे स्टेशन जैसे कई ऐतिहासिक स्थल हैं. रामेश्वरम एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है और यहां हर साल लाखों पर्यटक आते हैं.
रामेश्वरम एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक स्थल है. यह शहर हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है और यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है.
यह धाम गुजरात राज्य के द्वारका जिले में स्थित है। द्वारका में द्वारकाधीश मंदिर है, जिसमें श्री कृष्ण की मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह मंदिर चार धामों में से एक है और चार धाम यात्रा का पश्चिमी धाम है।
द्वारका भारत के गुजरात राज्य के देवभूमि द्वारका ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर और नगरपालिका है. द्वारका गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है. यह हिन्दुओं के चारधाम में से एक है और सप्तपुरी (सबसे पवित्र प्राचीन नगर) में से भी एक है. यह श्रीकृष्ण के प्राचीन राज्य द्वारका का स्थल है और गुजरात की सर्वप्रथम राजधानी माना जाता है.
द्वारका का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने मथुरा से निकाले जाने के बाद द्वारका नगरी बसाई थी. द्वारका नगरी सोने और चांदी से बनी थी और यह बहुत ही समृद्ध थी. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण ने अपने सभी भाइयों और परिवार के साथ रहकर अपना राज्य चलाया था.
द्वारका नगरी का वर्णन महाभारत के आठवें स्कंध में मिलता है. महाभारत में कहा गया है कि द्वारका नगरी एक बहुत ही सुंदर नगरी थी. द्वारका नगरी में कई मंदिर और महल थे. द्वारका नगरी में एक बहुत ही विशाल समुद्र तट भी था. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण ने अपने सभी भाइयों और परिवार के साथ रहकर अपना राज्य चलाया था.
द्वारका नगरी आज भी एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण के कई मंदिर हैं. द्वारका नगरी में एक बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है, जिसका नाम द्वारकाधीश मंदिर है. द्वारकाधीश मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है. द्वारकाधीश मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है.
द्वारका नगरी एक बहुत ही पवित्र नगरी है. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण ने अपना राज्य चलाया था और उन्होंने अपने भक्तों को बहुत सारी शिक्षाएं दी थीं. द्वारका नगरी एक बहुत ही ऐतिहासिक नगरी भी है. द्वारका नगरी में कई ऐतिहासिक स्थल हैं, जो आज भी मौजूद हैं.
द्वारका नगरी एक बहुत ही लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है. द्वारका नगरी में हर साल लाखों पर्यटक आते हैं. द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण के मंदिरों के अलावा, कई अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं. द्वारका नगरी में एक बहुत ही सुंदर समुद्र तट भी है. द्वारका नगरी एक बहुत ही शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक स्थान है.
चार धाम यात्रा का क्रम क्या है?
ऐसा माना जाता है कि यमुनोत्री से यात्रा की शुरुआत करने पर बिना किसी बाधा के आपकी चारधाम यात्रा पूर्ण हो जाती है। इसके साथ ही शास्त्रों में वर्णित है कि, यात्रा की शुरुआत पश्चिम से की जाती है और पूर्व में समाप्त होती है इसलिए भी सबसे पहले यमुनोत्री धाम के दर्शन किये जाते हैं। तीर्थयात्रा यमुनोत्री से शुरू होती है, गंगोत्री की ओर बढ़ती है, केदारनाथ पर जाती है और अंत में बद्रीनाथ में समाप्त होती है। यात्रा सड़क या हवाई मार्ग से पूरी की जा सकती है। कुछ भक्त दो धाम यात्रा या दो तीर्थस्थलों - केदारनाथ और बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा भी करते हैं।
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